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कर्ज की खेती को नहीं मिल रहा ‘भाव’ इसलिए मर रहा किसान

60 साल में 200 गुना बढ़ी महंगाई पर अनाज के भाव सिर्फ 25 गुना बढ़े, 1958 में सोना था 113 रुपए तोला, डीजल 84 पैसे लीटर और गेहूं का भाव 65 रु. क्विंटल, 2017 में सोना 30000 रुपए तोला, डीजल 58 रुपए लीटर और गेहूं 1625 रुपए क्विंटल

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Suresh Kumar Mishra

Jul 10, 2017

satna news

karj me dooba kisaan


सतना। यदि किसी उद्योग को खड़ा करने के लिए सरकार व्यापारी को रॉ मटेरियल में सब्सिडी, उद्योग चालने के लिए शून्य ब्याज पर कर्ज दे लेकिन फैक्ट्री से निकले उत्पाद का भाव उसके लागत मूल्य के बराबर या कम रखे तो यह उद्योग कितने दिन चल सकता है। बस, एक या दो साल। फिर व्यापारी सरकारी कर्ज में दकबर दिवालिया हो जाएगा। वर्तमान में खेती कर रहे किसानों की हालत कुछ एेसी ही है। प्रदेश सरकार खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए किसानों को खाद-बीज पर सब्सिडी बांट रही है। खेती के लिए सोसायटी के माध्यम से ऋण भी दे रही है, लेकिन जब फसल पककर तैयार होती है तो किसानों को बाजार में उनकी उपज का लागत मूल्य भी नहीं मिलता।

परिणाम यह है कि साल-दर-साल कर्ज की खेती कर किसान दिवालिया हो चुका है और आत्महत्या करने को मजबूर है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि वर्तमान में एक एकड़ में गेहूं की फसल की कुल लागत 17 हजार रुपए आती है। किंतु सरकार द्वारा समर्थन मूल्य मात्र 1625 रुपए क्विंटल तय किया गया है। यह उसके लागत मूल्य से भी कम है। किसान कड़ाके की ठंड, बारिश और झुलसाती गर्मी में रात-दिन खेतों में मेहनत करता है और जब उसकी फसल तैयार होती है तो व्यापारी उसे लागत मूल्य में भी नहीं खरीदते। इससे खेती पर निर्भर किसान कर्ज में दबकर आत्मघाती कदम उठा रहे हैं।

किसानों को सिर्फ योजनाओं का झुनझुना
बीते 60 साल में महंगाई और वस्तुओं के दाम में 200 गुना की वृद्धि हो चुकी है। महंगाई से राहत के लिए सरकारों ने कर्मचारियों के वेतन चार सौ गुना तथा सांसद-विधायकों का वेतन 500 गुना तक बढ़ा दिया। व्यापारी हर साल महंगाई के अनुसार अपने उत्पाद का मूल्य उनके मूल्य से तीन गुना तक बढ़ा दिए। लेकिन केन्द्र और राज्य की सरकार किसानों को महंगाई से राहत देने बीते 60 साल से योजनाओं का झुनझुना पकड़ा रही है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि बीते 60 साल में अनाजों के दाम महज 25 फीसदी बढ़े हैं। 1968 में अनाज का मूल्य इतना था कि किसान दो क्विंटल गेहूं बेचकर एक तोला सोना खरीद सकता था पर आज किसान 15 क्विंटल अनाज बेचकर भी एक तोला सोना नहीं खरीद सकता।


यूं तो खेती बन चुकी लाभ का धंधा
वर्तमान में सरकार खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए जो योजनाएं चला रही है उनसे सिर्फ उत्पादन बढ़ा है। देश में वस्तुओं के दाम बढ़ते जा रहे हैं, इससे खेती की लागत भी बढ़ रही है। लेकिन, लागत के अनुसार किसानों को उनकी उपज का भाव नहीं मिल रहा। यही वजह है कि अनाज की बंपर पैदावार करने के बाद भी किसानों की हालत खस्ता है। हर साल सैकड़ों क्विंटल उपज बेचने के बाद भी सोसाइटी का कर्ज नहीं चुका पा रहे। कृषि विशेषज्ञों का कहना है, जब तक खेती को उद्योग का दर्जा नहीं मिलेगा और अनाज का मूल्य तय नहीं होगा, किसानों के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाएं फ्लॉप होती रहेंगी।


बस इतना करे सरकार

1. खेती को मिले उद्योग का दर्जा

2. खेती बचाने कृषि आयोग का गठन

3. उत्पादों की तरह अनाज का भी लागत मूल्य तय हो

4. वाहन बीमा की तरह हो फसलों का बीमा

5. कृषि आधारित लघु उद्योगों की स्थापना


756 करोड़ की खेती, 900 करोड़ कर्ज
बीते साल खरीफ और रबी को मिलाकर जिले के किसानों ने लगभग 756 करोड़ रुपए की फसल बेची। इसके बाद भी वे बैंक एवं सोसायटियों का कर्ज नहीं चुका सके। खेती से लागत न निकलने के कारण किसानों के सिर पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। जिले के किसानों की माली हालत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक साल में वे लगभग 800 करोड़ की फसल उगाते हैं। जबकि उनके सिर पर 900 करोड़ रुपए का सरकारी कर्ज है।



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