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जानिए किन रसायनों के कारण पटाखों से निकलती है रंग-बिरंगी रोशनी और कैसे पहुंचाते हैं नुकसान

छोटे पटाखों से रहें खुश, बचाएं पर्यावरण, दीपावली पर खास तौर से युवा पीढ़ी को निभानी होगी जिम्मेदारी, पर्यावरण का ख्याल रख सेलिब्रेट करें दीवाली  

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firecrackers

Fatal effects of firecrackers

सतना. दीपावली नजदीक है। खुशी, रोशनी और उत्साह के साथ ही पटाखों के शोर से ध्वनि प्रदूषण और धुएं से वायु प्रदूषण की चर्चा भी शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पटाखे जलाने को लेकर प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए हैं। साल में एक बार आने वाले इस बड़े त्यौहार को लेकर समाज का एक बड़ा वर्ग भी यही मानता है कि इसमें पटाखों पर रोक आदि की बात नहीं होना चाहिए। लेकिन कुछ उपाय ऐसे हैं जो खुशी और उत्साह को कायम रखते हुए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी मददगार हो सकते हैं। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एके श्रीवास्तव का युवा पीढ़ी से अपील है कि वह जागरूक बने और बड़े विषैले पटाखे छुड़ाने से बचें। अगर छोटे पटाखे छुड़ाएं जाते हैं, तो इससे भी दिवाली की सेलिब्रेशन में कमी नहीं आएगी।

इन रसायनों के कारण निकलती है रंग-बिरंगी रोशनी
- पटाखे में हरी रोशनी निकालने के लिए बेरियम नाइट्रेट का उपयोग होता है। यह विस्फोटक भी होता है ।
- लाल रंग की रोशनी निकालने के लिए उसमें सीजीएम नाइट्रेट डाला जाता है। इसका प्रयोग ज्यादातर अनार और रॉकेट में होता है ।
- पटाखों के बारूद के साथ सीजीएम नाइट्रेट मिलाकर एक ठोस पदार्थ तैयार होता है। इसमें नाइट्रेट की मात्रा बढ़ाई जाती है। इससे इसका रंग और भी गाढ़ा पीला हो जाता है। इसी वजह से यह आग लगने पर पीली रोशनी छुड़ाता है ।
- पटाखे बनाने के लिए कई तरह के रसायन जैसे कैडमियम, लेड, मैग्नीशियम, सोडियम, जिंक, नाइट्रेट और नाइट्राइट का उपयोग होता है। यह सेहत के लिए नुकसानदेह होते हैं।

नुकसान
- इन रसायनों से बने पटाखों की ध्वनि भी 125 डेसीबल से ज्यादा होती है जो सुनने की क्षमता को प्रभावित करती है आम दिनों में शोर का मानक स्तर जहां दिन में 55 और रात में 45 डेसीबल के आसपास होता है वहीं दीपावली में यह स्तर 70 से 90 डेसीबल तक पहुंच जाता है ।
- पटाखों से निकलने वाली चिंगारी की वजह से आंखें और चेहरा जख्मी हो सकते हैं ।
- इनकी धुएं से सांस संबंधी बीमारियां होना सबसे आम है। सांस की बीमारी के मरीजों, बच्चों व बुजुर्गों को काफी परेशानी होती है। इन रसायनों और गैस की मात्रा अधिक होने से स्वसन नली सिकुडऩे लगती है। इसकी वजह से मरीजों को सांस लेने में परेशानी होती है।
- पटाखों के धुए से गले में संक्रमण, हृदय संबंधी परेशानियां, उच्च रक्तचाप, एलर्जी जैसी समस्याएं हो सकती है ।
- कई लोगों को पटाखों के कारण अवसाद, घबराहट, उल्टी होना जैसी स्वास्थ्य जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।

युवा बने जागरूक
सबसे ज्यादा पटाखे जलाने का शौक युवा पीढ़ी रखती है। उन्हें समझाइश दी गई कि बड़े विषैले पटाखों की जगह फुलझडिय़ां जलाकर खुशियां मनाएं। कम आवाज वाले छोटे पटाखे भी जलाए जा सकते हैं। छोटे पटाखों से कम आवाज आती हैं इनमें विषैली गैसों का स्तर ना के बराबर होता है। ऐसा कर युवा पीढ़ी खुद के स्वास्थ्य के साथ पर्यावरण को नुकसान से बचा सकती है।

हो सकती है कार्रवाई
एके श्रीवास्तव का कहना है कोर्ट की गाइडलाइन के मुताबिक क्षेत्र के थाना प्रभारी को कार्रवाई के अधिकार है। अगर किसी भी एरिया में या कोई भी व्यक्ति प्रदूषण युक्त पटाखों को जलाता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है।