सुरेश मिश्रा @ सतना। अंग्रेजों ने क्रांति को दबाने के लिए लाखों अत्याचार किए। फिर भी स्वतंत्रता सेनानियों का उत्साह ठंडा नहीं पड़ा। जंग की शुरुआत 1857 में स्थापित गदर पार्टी से हुई। तबसे आजादी मिलने तक रुकी नहीं। आखिरकार, 15 अगस्त 1947 को देश अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्र हो गया।
विंध्य की धरा में ऐसे ही क्रांतिकारी डॉ. लालता प्रसाद खरे भी आंदोलन के साक्षी रहे हैं। जो 96 वर्ष की आयु में भी जबरदस्त याददाश्त के साथ 'उन दिनों' की बात बड़ी संजीदगी से करते हैं।
पन्ना जिले के मढिय़ाताल में जन्मडॉ. खरे का जन्म 14 मार्च 1921 को पन्ना जिले के मढिय़ाताल में हुआ था। खरे के पिता स्व. मुंशी ठाकुर प्रसाद एजेंट की हैसियत से पन्ना में कार्य करते थे। प्रारंभिक शिक्षा रीवा के दरबार इंटर कॉलेज में करने के बाद इंदौर स्थिति किंग एडवर्ड मेडिकल स्कूल में पढ़ाई की। यहीं से डॉ. खरे का रुझान आजादी के आंदोलन की तरफ हो गया।
9 अगस्त को प्राचार्य की मौतकिंग एडवर्ड मेडिकल स्कूल में पढ़ाई के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल रहे डॉ. खरे बताते हैं, 9 अगस्त 1942 को तत्कालीन प्राचार्य की मौत पर उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। एक शिक्षण सत्र की समाप्ति के बाद पुन: बिना शर्त प्रवेश दिया गया। लेकिन छात्रावास में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलने पर इंदौर छोडऩा पड़ा।
मीरज स्कूल में दाखिलाडॉ. खरे ने स्कूल से निष्कासन के बाद महाराष्ट्र के पुणे जिले के सांगली स्थित मीरज स्कूल में दाखिला लिया। जहां से विधिवत मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर एलएमपी (सीएस) की डिग्री ली। इस दौरान उन्होंने जयागुनिस विवि वियना (आस्ट्रिया) में कई शोध किए।
कई बार गिरफ्तारियां दींखरे ने बताया, छात्र जीवन से ही मन में आजादी की जंग छिड़ गई थी। सतना में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण कई बार पुलिस द्वारा गिरफ्तारियां की गई है। 1932 से 1939 के बीच आंदोलन की रैलियां छतरपुर, पन्ना, नागौद के रास्ते जबलपुर जाया करती थी। जिनमें विंध्य का नेतृत्व किया।