
Ganga Dussehra 2018 in satna
सतना। मध्यप्रदेश के सतना जिला मुख्यालय से करीब 55 किमी. दूर स्थित सरभंग मुनि आश्रम देशभर में आस्था का केन्द्र बना हुआ है। पौराणिक जानकार सरभंग मुनि आश्रम स्थित कुंड को '100 बार गंगा, तो एक बार सरभंगा' जैसी कहावतों को बोलकर आश्रम का महत्व बताते है। गंगा दशहरा के दिन दूर-दराज से हजारों की संख्या में भक्त आश्रम पहुंचकर इस कुंड में स्नान करते है। कहा जाता है कि इस कुंड में स्नान करने के बाद भक्तों को मन चाहा वरदान मिलता है। इसलिए दूर-दराज से भक्त खीचें चले आते है। तुलसीकृत रामायण के अरण्यकांड में इस आश्रम का विधिवत वर्णन किया गया है।
कृष्ण ने स्वयं को नदियों में गंगा कहा
विष्णु पुराण में कहा गया है कि गंगा का नाम लेने, सुनने, उसे देखने, उसका जल ग्रहण करने, छूने और उसमें स्नान करने से मनुष्य के जन्मों-जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं। भगवान कृष्ण ने स्वयं को नदियों में गंगा कहा है। 'गम् गम् गच्छति इति गंगा' अर्थात गम गम स्वर करती बहती है गंगा। 'गंगा तव दर्शनात मुक्ति:' अर्थात गंगा का दर्शन मात्र ही मोक्ष देने वाला है। गंगा हमारे पुरखों को तारती हैं। गंगा हैं कलियुग की प्रधान तीर्थ। ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है। इस बार यह 24 मई को है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को संवत्सर का मुख भी कहा गया है। इस वर्ष इसकी महिमा इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि पुरुषोत्तम (मलमास) माह भी चल रहा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य की वृष और चंद्रमा की कन्या राशि में गंगा का हिमालय से निर्गमन हुआ था। वैदिक एवं पौराणिक ग्रंथों- श्रीमद्भागवत, महाभारत आदि में इसका विस्तार से वर्णन है।
सरभंग मुनि आश्रम का इतिहास
संतों की मानें तो भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास के दौरान सरभंग मुनि को 12वें वर्ष में अहसास हो गया था कि भगवान राम एक दिन हमारे आश्रम आएंगे। और उद्धार करेंगे। भगवान के आने की प्रतीक्षा में सरभंग मुनि ने अपनी श्वसन क्रिया रोक रखी थी। जैस-जैसे भगवान आश्रम की ओर बढ़ रहे थे वैसे-वैसे सरभंग मुनि को आभास हो रहा था। फिर क्या भगवान ने भक्त की परीक्षा लेने के लिए एक जगह रूक गए। इधर, सरभंग मुनि ब्रह्मलीन होने वाले थे। ब्रह्मा भी संशय में पड़ गए कि आखिर क्या होने वाला है। ब्रह्मा ने तुरंत भगवान को संदेशा भेजा कि भगवान आप जल्द जाएं आपके इंतजार में सरभंग मुनि ने श्वास रोक रखी है। आपके जल्द जाने से उनको मोक्ष मिल जाएगी। रामायण के जानकारों ने बताया कि तुलसीकृत रामायण के अरण्यकांड में इस बात का जिक्र किया गया है।
दर्शन के बाद सरभंग मुनि ब्रह्मलीन
सरभंग मुनि के सामने जैसे ही भगवान आए तो मुनि को अहसास हो गया। सरभंग मुनि ने भगवान राम से कहा कि भगवान बस आपकी मैं प्रतीक्षा कर रहा था। आप आए और हम धन्य हुए, हमको आज्ञा दे जिससे मैं बैकुंठ जा सकूं। भगवान की आज्ञा के बाद मुनि की श्वसन क्रियाएं रूक गई और वह ब्रह्मलीन हो गए। तुलसीकृत रामायण में इस बात का जिक्र किया गया है कि भगवान अपने वनवास के दौरान चित्रकूट में 12 वर्ष बिताया। फिर महाराज दशरथ का देहावसान हो जाता है। इसके बाद भरत जी राम को बुलाने वनवास की ओर कूच करते है। जहां चित्रकूट में भरत मिलाप होता है। इसके बाद राम चित्रकूट से प्रस्थान करते है। और अमरावती आश्रम के रास्ते सरभंग मुनि आश्रम में सरभंग जी से मिलने के बाद एक दिन यही रुकतें है। ऐसा मंदिर के संत-महात्मा बताते है।
कमी नहीं बंद होती ये जल धाराएं
आश्रम के पास ही स्थित ब्रह्म कुंड की जल धाराए आश्रम तक पहुंचती है। बताया गया कि संत-महात्माओं की मांग पर ब्रह्म ने स्वंय प्रगट होकर ब्रह्म कुंड बनाया था। भगवान का प्रताप है कि ये जल धाराएं कभी बंद नहीं होती है। आदिकाल से लगातार इसी तरह चलती आ रही है। सरभंगा आश्रम के गेट के ठीक सामने दो कुंड प्राचीन काल से बने हुए है। बता दें कि इसी कुंड में माता सीता स्नान किया करती थी। एक से भगवान के स्नान और दूसरे से स्वंय का स्नान हुआ करता था। जो आज भी प्रथा चली आ रही है। जानकार बतातें है कि इस अद्भुत कुंड की महिमा को देखकर भगवान राम-लक्ष्मण सहित माता सीता ने कहा था कि जो इस कुंड में चाहे गंगा के 11 बार स्नान करले या फिर सरभंगा आश्रम के इस कुंड का एक बार स्नान करले बराबर पुण्य मिलेगा। जिसको लोग आज भी माता का बरदान समझकर आस्था के साथ स्नान करते है।
Published on:
22 May 2018 06:27 pm
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