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International Labor Day: नोटबंदी ने छीना काम,यहां आज भी मजबूर है ‘मजदूर

आज ही के दिन दुनिया के मजदूरों को अनिश्चित काम के घंटों को आठ घंटे में तब्दील कर मुक्ति का मार्ग दिखाया गया था

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International Labor Day

International Labor Day

सतना. आज मजदूर दिवस है। आज ही के दिन दुनिया के मजदूरों को अनिश्चित काम के घंटों को आठ घंटे में तब्दील कर मुक्ति का मार्ग दिखाया गया था। लेकिन मुक्ति का मार्ग अंतहीन रास्ते की भांति लगातार लंबा होता रहा। दूसरी तरफ मजदूरों की जिंदगी बेरोजगारी, भूखमरी, अशिक्षा, कुपोषण की भेंट चढ़ रही है। मजदूर दिवस पर मजदूरों से बातचीत के क्रम में उनकी बदहाल जिंदगी यही सब कुछ बयां कर रही थी। जबकि इनमें से कइयों को मजदूर दिवस के बारे में पता तक नहीं था।

शहर की मजदूर मंडी में मजदूरी की तलाश में बैठे श्रमिक,मजदूर दिवस के बारे में अनभिज्ञता प्रकट करते हुए बताते हैं कि उनकी जिंदगी में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। सरकारों ने श्रमिक एवं उनके परिवार के हित में कई योजनाए चलाई। लेकिन यह अंतिम पायदान पर खड़े गरीब श्रमिक की हालत नहीं बदल सकी। 100 दिन काम की गारंटी योजना हो या श्रमिक वृद्धा पेंशन योजना। मजदारों को आज तक न काम की गारंटी मिली और न ही उन्हें शोषण से आजादी। श्रमिक आज भी दो वक्त की रोटी के लिए दिनभर जद्दोजहद करता दिखाई दे रहा है। देश 100 साल से मजदूर दिवस मना है, लेकिन मजदूर के दिन नहीं बदते। मजदूर आज भी मजबूर है।

मजदूर दिवस क्यों
1 मई 1886 को अमेरिका की सड़कों पर तीन लाख मजदूर उतर आए। वे विरोध कर रहे थे कि काम के घंंटों को आठ घंंटे किया जाए। इस हड़ताल के दौरान शिकागो की हेय मार्केट में बम ब्लास्ट हुआ था। प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए गोलियां चला दी गईं। कई मजदूर मारे गए। शिकागो शहर में शहीद मजदूरों की याद में पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया। पेरिस में सन् 1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में एलान किया गया कि हेय मार्केट में मारे गए निर्दोष लोगों की याद में 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा। भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत चेन्नई में हुई। किसान पार्टी ऑफ हिन्‍दुस्‍तान ने 1 मई 1923 को मद्रास में इसकी शुरुआत की थी। तब से भारत में इसे राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है।
मंडी में लगती है बोली बिकता है मजदूर

अनाज मंडी, सब्जी मंडी, फल मंडी का नाम सभी जानते हैं। लोगों ने इन मंडियों में जाकर खरीददारी भी करते हैं। लेकिन शहर में एक नहीं दो एेसी मंडियां भी है। जहां अनाज व फल सब्जी नहीं इन्हें उगाने वाला इंसान स्वयं बिकता है। जी हां हम बात कर रहे है लालता चौक व सिंधीकैंप स्थित मजदूर मंडी की। सड़क व चौराहे पर लगने वाली इस मंडी में प्रतिदिन लगभग दो हजार श्रमिका काम की तलाश में पहुंचता है। शहर के जरूरत मंद लोग मंडी पहुंच कर इन श्रमिकों की बोली लगाते है तक जाकर उन्हें आठ घंटे की हाड़तोड़ मेहनत के बाद दो वक्त की रोटी नसीब होती है। लगभग १५ साल से जिला मुख्यालय में लगने वाली इन मंडियों में न तो छाया के लिए टीनशेड लगाया गया और न ही श्रमिकों के लिए पानी की व्यवस्था की गई। चिचलिलाती धूप हो या झमझम बारिश मजदूर दुकानों के बाहर बने बारजे की छांव में खड़े होकर ग्राहक का इंतजार करते हैं।
शहर की लालता चौक स्थित मजदूरी मंडी में काम के लिए ग्राहकों की राह देख रहे श्रमिकों से जब उनके लिए संचालिक योजनाओं पर चर्चा की गई तो श्रमिकों ने कहा की सरकारी योजनाएं सिर्फ दिखावा है। यदि उन्हें गांव में काम और रोजगार की गारंटी मिलती तो वह घर से 30 किमी दूर शहर में काम की तलाश में नहीं भटकते। सुबह 11 बजे झुलसाती गर्मी के बीच काम मिलने की आस लगाए बैठे श्रमिकों ने कहा की क्या करे मजबूर है। सरकार और नेताओं को हम श्रमिकों की याद सिर्फ चुनाव के समय ही आती है। हम लोकतंत्र में अपनी भागीदारी निफा जिन्हें जमीन से उठाकर दिल्ली तक पहुंचा वह करोड़पति हो गए। लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी यह हमे रोटी कपड़ा और मकान की गारंटी नहीं दे पाए। जीवन के अंतिम पड़ाव में मजदूरी करने को मजबूद बुजुर्ग श्रमिक ने कहा की सरकार बुढ़ापे में रोटी की गारंटी देती तो इस उम्र में मंडी क्यों आते।

श्रमिक बोले भीख नहीं रोजगार चाहिए
सरकार श्रमिकों के लिए कई योजनाए चला रही है। लेकिन इनका लाभ नहीं मिल रहा। यदि हमे गांव में रोजगार मिलता तो हम काम की तलाश में शहर क्यों आते। मनरेगा हो या अन्य योजनाएं यह सिर्फ दिखावे के लिए चल रही है। इनके श्रमिकों का भला नहीं होगा। सरकार को हमारी चिंता है तो रोजगार दे। हम मेहनत कर अपने परिवार का पेट पालना चाहते हैं।

राजू केवट, उचवा टोला

सरकार की किसी भी योजना का लाभ नहीं मिल रहा। गांव में काम तो मिलता है लेकिन उचित मजदूरी नहीं मिलती। इसलिए काम की तलाश में यहां आते हैं। मंडी में बैठने से एक माह में बीस दिन काम मिलता है। 10 दिन खाली हाथ लौटना पड़ता है। युवा हूं लेकिन रोजगार न मिलने के कारण बेगारी करने को मजबूर हो।
सुरजीत कुमार, सेमरिया


दिहाड़ी करते आधी उम्र निकल गई। आज तक सरकार से कोई मदद नहीं मिली। गरीबी रेखा में नाम जुड़ा है। सरकार हर माह २५ किलो राशन दे देती है। कहने के लिए कई योजनाए हैं, लेकिन लाभ नहीं मिलता। मजूदर की याद सिर्फ चुनाव के समय ही आती है। चुनाव के बाद कोई हालचाल लेने नहीं आता।

रामलाल वर्मा, बगैची

हम श्रमिक है हमे सरकार से मुफ्त की योजनाएं नहीं रोजगार चाहिए। हमे अधिकार चाहिए काम का। श्रमिकों का शोषण बंद हो। काम का समय और मजदूरी तय हो। सरकार युवाओं को रोजगार, सुरक्षा एवं स्वास्थ्य की गारंटी दे। तभी श्रमिकों के दिन बदल सकते हैं।
रामकेश, पतेरी