
International Tiger Day: Story of World First White Tiger Mohan
रीवा। 27 मई 1951! सीधी के कुसमी क्षेत्र के पनखोरा गांव के नजदीक महाराजा मार्तण्ड सिंह शाही मेहमान जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह के साथ बाघिन का शिकार करने पहुंचे। उन्हें देख जंगल में हलचल होती है और तीन शावक तेजी से भाग जाते हैं, लेकिन एक सफेद रंग का अद्भुत शावक वहीं गुफा में छिप गया। यह देख मार्तण्ड सिंह उसे मारने की बजाय पकडऩे की योजना बनाते हैं।
महाराजा के आदेश पर पिंजड़ा लगाकर शावक को पकड़ा जाता है। सफेद शावक को फिर गोविंदगढ़ किले में लाया जाता है और उसका नाम मोहन रखा जाता है। दरअसल, मोहन को पकडऩे से लेकर उसकी आखिरी सांस तक के केवल एक ही गवाह के रूप में पुलुआ बैरिया ही बचे हैं। जब वह उसकी कहानी साझा करते हैं तो उनकी आंखों से मोहन के प्रति प्रेम छलक आता है।
पुलुआ बताते हैं कि जब महाराजा मार्तण्ड सिंह गोविंदगढ़ किले में बाघ को लेकर आए तो पूरा क्षेत्र देखने के लिए उमड़ पड़ा। मैं भी बालक था तो सबके साथ गया। परिवार के कुछ लोग किले में काम करते थे, वह जब बाघ को भोजन देने के लिए जाते तो मैं भी नजदीक से देखने की उत्सुकता के लिए जाता। महाराजा को पता चला तो उन्होंने हमारी ड्यूटी ही मोहन की सेवा में लगा दी।
सम्मान से मोहन का नाम पुकारते थे केयर टेकर
पुलुआ आगे बताते हैं कि हम सभी राजा की तरह ही उसे सम्मान देते थे। जितने केयर टेकर थे, सभी मोहन सिंह इधर आइए-मोहन सिंह उधर जाइए, इस तरह की सम्मानित भाषा का प्रयोग करते थे। हम सब के अलावा मोहन किसी को नजदीक से जानते थे तो वह थे महाराजा मार्तण्ड सिंह। अकसर दोपहर के बाद महाराजा फुटबाल लेकर मोहन के बाड़े के पास पहुंचते थे।
रविवार के दिन मोहन खाना नहीं खाते थे
ऊपर छत पर बैठकर वह बाड़े की दीवार की ओर बाल फेंकते तो मोहन उसे पकडऩे के लिए दौड़ते थे। कई बार तो ऐसे भी अवसर आए जब महाराजा ने मोहन के नजदीक तक जाकर सिर पर हाथ फेरा। रविवार के दिन मोहन खाना नहीं खाते थे, शुरुआत में इसे सामान्य रूप में लिया गया, लेकिन जब यह प्रक्रिया लगातार चली, तो महाराजा ने कहा इसे दो लीटर दूध दिया जाए।
इग्लैंड के डॉ. वेल्सन ने किया उपचार
पुलुआ बताते हैं कि बीमार होने पर इंग्लैंड के डॉ. वेल्सन ने लंबे समय तक मोहन की देखरेख की और उन्होंने नए सिरे से आहार की मात्रा निर्धारित की थी। मौत से कुछ समय पहले मोहन के पैर में लकवा मार गया। हम सब आखिर तक देखरेख करते रहे। 10 दिसंबर 1969 को मोहन का निधन हो गया।
भागकर मुकुंदपुर में ली शरण
पुलुआ बताते हैं कि गोविंदगढ़ किले में मोहन को रखे दो दिन का ही समय हुआ था कि रात्रि में दीवार फांदकर वह भाग निकले। महाराजा ने चारों ओर तलाश कराई तो मुकुंदपुर के मांद रिजर्व क्षेत्र के जंगल में मिले। वह क्षेत्र बाघों के लिए प्रिय माना जाता है।
ऐसा रहा मोहन का सफर
- 1955 में पहली बार सामान्य बाघिन के साथ ब्रीडिंग कराई गई, जिसमें एक भी सफेद शावक नहीं पैदा हुए।
- 30 अक्टूबर 1958 को मोहन के साथ रहने वाली राधा नाम की बाघिन ने चार शावक जन्मे, जिनका नाम मोहिनी, सुकेशी, रानी और राजा रखा गया।
- 19 वर्षों तक जिंदा रहे तीन मादाओं के साथ मोहन के संसर्ग गोविंदगढ़ में लगातार सफेद शावक पैदा होते गए। मोहन से कुल 34 शावक जन्मे, जिसमें 21 सफेद थे। इसमें 14 राधा अकेले नाम की बाघिन के थे।
- गोविंदगढ़ किले में 6 सितंबर 1967 को मोहन और सुकेशी से चमेली जन्मी और 17 नवंबर 1967 को विराट नाम का सफेद शावक जन्मा।
- 1972 में मोहन की मौत के बाद सुकेशी नाम की बाघिन को दिल्ली के चिडिय़ाघर भेजा गया।
- 1973 में चमेली को लेकर मोहन के केयर टेकर पुलुआ बैरिया को भी दिल्ली बुला लिया गया। 2003 तक दिल्ली के चिडिय़ाघर में उन्होंने सेवाएं दीं।
- 8 जुलाई 1976 को आखिरी बाघ के रूप में बचे विराट की भी मौत हो गई। 40 साल तक सफेद शेरों से रीवा वीरान रहा।
- 9 नवंबर 2015 को सफारी में विंध्या को लाया गया।
Published on:
29 Jul 2019 12:13 pm
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