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पंजाब ही नहीं मध्यप्रदेश के सतना जिले में भी हुआ था जलियावाला बाग हत्याकांड, 109 योद्धा हुए थे शहीद

- 1857 की क्रांति में शहीद हो गए थे पिंड्रा के 109 योद्धा, आज 'अपनों' से उपेक्षित

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Jallianwala Bagh massacre was not only in Punjab but also in Satna district of Madhya Pradesh, 109 warriors were martyred

Jallianwala Bagh massacre was not only in Punjab but also in Satna district of Madhya Pradesh, 109 warriors were martyred

सतना. देश की आजादी में पिंड्रा गांव ( Pindra Village ) के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। 1857 की क्रांति ( 1857 Revolution ) में यहां के 109 आदिवासियों ( 109 warriors were martyred ) ने अंग्रेजों से लड़ते हुए प्राणों की बलि दे दी थी। उनकी कुर्बानी पर पूरे जिले को फक्र है। पिंड्रा सहित आसपास के लोग इसे जिले का जलियावाला बाग ( Satna Jallianwala Bagh ) कहते हैं। लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा से आहत हैं। कहते हैं कि पुरखों ने जान की बाजी लगाकर अंग्रेजों से आजाद करा दिया, लेकिन वर्तमान में व्याप्त भ्रष्टाचार व अंधेरगर्दी से कौन आजाद कराए। छोटे-मोटे काम भी बिना रिश्वत के नहीं होते।

बताया गया कि 1857 में कुंवर अमर बहादुर ठाकुर रणवंत सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ कैमूर की पहाडिय़ों में छापामार युद्ध लड़ा गया था। इसमें अंग्रेजों के पसीने छूट गए थे। हालांकि, बाद में पिंड्रा गांव के हैं, तो तोप-गोलों से लैस अंग्रेजी फौज ने पिंड्रा गांव पर हमला बोल दिया था। घरों में आग लगा दी, तरह-तरह की यातनाएं दी गईं, आदिवासी योद्धा पीछे नहीं हटे। अंतिम दम तक संघर्ष करते रहे। इस युद्ध में शहादत को प्राप्त हुए 109 आदिवासी योद्धाओं का जिक्र तत्कालीन समाचार पत्रों व गांव में बनाए गए शहीद स्मारक में भी है।

पिंड्रावासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में ही विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था। जो आजदी मिलने तक जारी रहा। 1920 से 1949 के स्वतंत्रता आंदोलन में भी इनके संघर्ष का इतिहास में जिक्र है। देश जब तक पूर्ण रूप से आजाद नहीं हो गया, तब तक पिंड्रावासियों ने चैन की नींद नहीं ली। प्राणों की बाजी लगाकर संघर्ष करते रहे। उनका ध्येय वाक्य था कि देश की स्वाधीनता, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक जनभागीदारी के बिना संभव नहीं है।

न्यूयॉर्क टाइम ने दी थी जगह
पिंड्रा के आदिवासियों के छापामार युद्ध का जिक्र अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयॉर्क टाइम में भी मिलता है। 1 अक्टूबर 1858 के अंक में 'भारत में विद्रोह' शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें छापामार युद्ध का जिक्र करते हुए पिंड्रा गांव के आदिवासियों के युद्ध शैली की तारीफ भी की थी। इतना ही नहीं अंग्रेजों के संघर्ष को भी कमजोरी के रूप में उजागर किया गया था।

एक अफसोस
पिंड्रा के वाशिंदे अतीत पर भले ही गर्व महसूस करते है, लेकिन वर्तमान हालातों से वे जरा भी संतुष्ट नहीं हैं। जिनके पुरखों ने देश की आजादी में अपनी जान की बाजी लगा दी। उन्हें आज सड़क, पानी और बिजली जैसी जरूरी सुविधाओं के लिए परेशान होना पड़ रहा है। आदिवासी बहुल्य इस गांव में रोजागर के कोई साधन नहीं हैं। रहवासियों की अजीविका खेती व वन उत्पादों पर आश्रित है, लेकिन धीरे-धीरे उसका भी दायरा सीमित होता जा रहा है। प्रकृति भी साथ नहीं दे रही। शासन स्तर से यहां के लोगों को विकास मुख्य धारा सेे जोडऩे के लिए ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे। दिग्विजय सरकार में पिंड्रा चौराहे पर बनाया गया शहीद स्मारक भी उपेक्षा की कहानी बयां करने लगा है।