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Labour Day: किसी को क्या बताएं मजदूर हैं, बस इतना समझ लीजिए मजबूर हैं हम

किसी को क्या बताएं मजदूर हैं, बस इतना समझ लीजिए मजबूर हैं हम

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सतना

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Sajal Gupta

May 01, 2018

International Labor Day: No Work in Singrauli for unemployees

International Labor Day: No Work in Singrauli for unemployees

सतना. लोगों ने आराम किया, अपनी छुट्टी पूरी की। लेकिन, एक मई को भी मजदूरों ने मजदूरी की। प्रदेश एवं जिले में श्रमिकों के जीवन में मजदूर दिवस का क्या महत्व है, यह शेर पूरी कहानी बयां कर रहा है...किसी को क्या बताएं मजदूर हैं हम, बस इतना समझ लीजिए मजबूर हैं हम। एक मई 1886 को अमरीका के शिकागो में मजदूरों ने लगातार 12 घंटे कार्य के विरोध में महाआंदोलन किया था। इसके लिए उन्हें गोली भी खानी पड़ी। मजदूरों की शहादत के बाद अमरीका में श्रमिकों को 12 घंटे की मजदूरी से निजाद मिल गई। लेकिन, देश में आज भी श्रम के नाम पर मजदूरों का शोषण जारी है। हम हर साल मजदूर दिवस मनाते हैं लेकिन श्रमिकों का शोषण कम कैसे हो, इस पर कोई विचार नहीं हो रहा। प्रदेश और देश की सरकार ने श्रमिकों के उत्थान के लिए कई योजनाएं बनाई, लेकिन उनका लाभ दिन-रात मेहनत करने वाले श्रमिकों तक नहीं पहुंच पा रहा। शहर में असंगठित श्रमिक दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। 100 किलो का बोझ उठाते हैं। इतनी मशक्कत के बाद भी उनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा है।
यहां नहीं चलता श्रम कानून
श्रमिकों का शोषण रोकने के लिए कई कानून बनाए गए। लेकिन शहर के होटलों, दुकान एवं कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों का शोषण करने वाले मालिकों पर कोई भी कानून लागू नहीं होता। शहर में प्रतिबंध के बावजूद श्रमिकों से बंधुआ मजदूर की तरह आज भी १२ घंटे काम लिया जाता है। होटलों एवं दुकानों में दिनभर कार्य बदले श्रमिकों को हर दिन 100 से न्यूनतम मजदूरी दी जाती है। प्रतिबंध के बावजूद शहर के पल्लेदार 100 किलो का बोरा उठाने को मजबूर हैं।
छाया-पानी तक नहीं
एक मई को भी लालता चौक मंडी पर श्रमिकों की भीड़ लगेगी। इससे एक दिन पहले झुलसती गर्मी में ग्राहक का इंतजार कर रहे श्रमिकों की मायूसी उनके दिल का दर्द बयां कर रही थी। जब उनसे मजदूर दिवस के बारे में पूछा गया तो ज्यादातर श्रमिकों ने कहा कि मजदूर दिवस क्यों मनाया जाता है? इसकी जानकारी हमें नहीं है। एक श्रमिक ने कहा, मजदूर दिवस सिर्फ सरकारी दिखावा है। इससे कुछ नहीं होगा। 10 साल से लालता चौक की मंडी में हम लोग जानवरों की तरह बिकते हैं। आज तक प्रशासन यहां पर छाया और पानी का इंतजाम नहीं कर पाया।
यहां रोज बिकता है मजदूर
श्रमिकों को रोजगार दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने मनरेगा जैसी योजना चलाई। लेकिन, उसका लाभ श्रमिकों को नहीं मिल रहा। शहर में मजदूरी कर किसी प्रकार परिवार का भरण-पोषण करने वाले हजारों श्रमिक शहर के चौराहों पर रोज बिकने के लिए आते हैं। लालता चौक एवं सिंधी कैंपचौराहा मजदूर मंडी के रूप में जाना जाता है। यहां सुबह होते ही काम की तलाश में हजारों मजदूर जमा होते हैं। मजदूरों की इस मंडी में सुबह से काम के लिए ग्राहक के इंतजार में बैठे श्रमिकों के चेहरे दिन चढऩे के साथ मुरझाने लगते हैं। ग्राहक मिल गया तो ठीक नहीं तो कल काम मिलेगा की उम्मीद के साथ घर वापस लौट जाते हैं।