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जानिए कौन थे छत्रसाल, जिन्होंने औरंगजेब सहित तमाम मुगल शासकों धूल चटाई, मप्र के इस शहर से था नाता

जयंती विशेष: छत्रसाल की वीरता व चातुर्यपूर्ण नीति से हार गया था औरंगजेब, विपरीत परिस्थिति में भी मिली जीत

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maharaja chhatrasal jyanti

maharaja chhatrasal jyanti

सतना. महाराजा छत्रसाल की वीरता, चातुर्यपूर्ण नीति और कौशल का कोई सानी नहीं था। जिसके बल पर उन्होंने अनेक बार मुगल शासकों को हार का स्वाद चखाया। युद्ध में उनका मुकाबला करने से पहले 100 बार सोचना पड़ता था।

परिवार से मिला प्रोत्साहन
बुंदेलखंड के शिवाजी के नाम से प्रख्यात छत्रसाल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया (3) संवत 1706 विक्रमी तदनुसार दिनांक 17 जून 1648 ईस्वी को पहाड़ी ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम चम्पराय और मां का नाम लालकुंवरी था। उनके पिता भी चम्पतराय वीर व बहादुर थे। चम्पतराय के साथ युद्ध में लालकुंवरी भी साथ रहती। इस दौरान पति का युद्ध क्षेत्र में उत्साहवर्धन करती। तब छत्रसाल अपनी मां के गर्भ में थे। मां लालकुंवरी की शिक्षा ने छत्रसाल को बहादुर और युद्ध कौशल में निपुण बनाया।

दस वर्ष की आयु में बन गए थे कुशल सैनिक
छत्रसाल अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कला की शिक्षा मामा के यहां मिली। महज दस वर्ष की आयु में ही छत्रसाल कुशल सैनिक बन गए थे। 16 वर्ष की आयु में छत्रसाल को माता-पिता से दूर होना पड़ा। उनकी जागीर छिन गई। लेकिन विषम परिस्थिति और कम आयु के बाद भी छत्रसाल ने विवेक और धैर्य से काम लिया। अपनी मां के गहने बेंचे। एक छोटी सी सेना बनाई। दुश्मनों से छोटे-छोटे युद्ध लड़ते अपना रास्ता तैयार करते रहे। फिर छोटी-छोटी रियासतों को वीरता पूर्वक जीता। धीरे-धीरे अपने राज्य की सीमा का विस्तार करते रहे। एक समय ऐसा भी आया जब छत्रसाल की युद्ध और सैन्य संचालन की कुशल नीति के आगे औरंगजेब की सेना को भी हार माननी पड़ी।

स्नेह के बल पर जीता जनता का विश्वास
छत्रसाल ने स्नेह के बल पर बुंदेलखण्ड की प्रजा से विश्वास जीता। छत्रसाल सभा में विद्वानों को सम्मानित करते थे। बुंदेलखण्ड का छतरपुर नगर महाराजा छत्रसाल का बसाया है। छत्रसाल की राजधानी महोबा थी। महाराजा छत्रसाल की 83 वर्ष की आयु में 14 दिसंबर 1731 ईस्वी को मृत्यु हुई।