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मैहर बैंड का दुनिया में बज चुका है डंका, 100 साल पूरे होने पर यहां होगा ऐतिहासिक कार्यक्रम

ऐतिहासिक कार्यक्रम की तैयारी, 25 एवं 26 नवंबर को होगा संगीतोत्सव, शामिल होंगे अंतरराष्ट्रीय स्तर के कलाकार

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सतना

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Suresh Mishra

Oct 14, 2017

Maihar Band: Latest News Videos Photos about Maihar Band

Maihar Band: Latest News Videos Photos about Maihar Band

सतना। देश के सुविख्यात संगीत घरानों में एक मैहर घराने की नींव रखने वाले उस्ताद अलाउद्दीन खां द्वारा स्थापित मैहर बैंड के 100 साल पूरे होने पर इस बार मैहर में ऐतिहासिक कार्यक्रम की तैयारी की जा रही है। इसके लिए भारत सरकार के संस्कृत विभाग की संगीत नाटक अकादमी द्वारा मैहर में 'संगीतोत्सवÓ का आयोजन 25 एवं 26 नवंबर को किया जाना तय किया गया है।

इस समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों के राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के (हिन्दुस्तानी संगीत के) कलाकारों द्वारा प्रस्तुति दी जाएगी। इस संबंध में मैहर बैंड से जुड़े शासकीय संगीत महाविद्यालय के प्राचार्य को अवगत कराते हुए आवश्यक तैयारी के निर्देश दिए गये हैं।

30 कलाकार होंगे शामिल
संगीत नाटक अकादमी के संजय भारद्वाज ने आयोजन के लिए अग्रिम कार्यवाही की सहमति पत्र में बताया है कि इस कार्यक्रम में लगभग 30 कलाकार शामिल होंगे। इसको लेकर मैहर बैंड के संचालक मंडल ने म.प्र. शासन संस्कृति संचालनालय से भी मदद चाही है। साथ ही अपेक्षा की है कि इस आयोजन की स्थानीय स्तर की जिम्मेदारी उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत नाटक एवं कला अकादमी भोपाल देखे। क्योंकि हर वर्ष इसके द्वारा यहां अलाउद्दीन खां संगीत समारोह का आयोजन कराया जाता है।

1917 में स्थापित हुआ था मैहर बैण्ड
मैहर बैण्ड की बुनियाद हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की महामेधावी शख्सियत और अन्वेषक बाबा अलाउद्दीन खां ने रखी 1917 में रखी थी। पांच वक्त के नमाजी और रोज सुबह चार किमी. से ज्यादा की पहाड़ी चढ़कर मैहर की शारदा देवी के दर्शन करने जाने वाले बाबा अलाउद्दीन खां ने दुनिया को पं. रविशंकर और निखिल बनर्जी सरीखे मूर्धन्य सितारवादक दिए हैं। दुनिया में सरोद की अलख जगाने वाले अली अकबर खां उनके अपने बेटे थे। इन्ही बाबा का शास्त्रीय साजों वाला यह अकेला-अनूठा बैंड है जिसके पास बंदूक की नाल से संगीत लहरियां छोडऩे वाला दुनिया का अनोखा साज है।

चार घंटे बजाते थे बैंड
इस बैण्ड की स्थापना मैहर के तत्कालीन राजा बृजनाथ सिंह के आदेश पर 1917 में एक बैंड पार्टी के रूप में की गई थी। इसमें सारे अनाथ बच्चों को शामिल किया गया था। तब सौ-डेढ़ सौ लड़के इकट्ठा किए गए थे। उस वक्त उस्ताद अलाउद्दीन खां राजा को आठ घंटे तक पढ़ाते थे तथा चार घंटे बैंड का काम देखते थे। 1949 में आजादी के बाद विंध्य प्रदेश बनने पर बैंड को खत्म करने की नौबत आ गई थी। पर तब केंद्र सरकार ने दखल देकर इसे बचा लिया। 1955 में यहां संगीत का एक कॉलेज खोलकर बैंड को उससे जोड़ दिया गया।

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