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इस राजा ने जिन्दा पकड़ा था सफ़ेद बाघ, 19 साल राजमहल की रहा शान

विश्व के पहले व्हाइट टाइगर सफारी का 3 अप्रैल को शुभारंभ होने जा रहा है। आइए, जानते हैं कैसे मांद का जंगल वक्त के साथ बदलता गया।

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Suresh Kumar Mishra

Apr 01, 2016

satna news

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सुरेश मिश्रा@सतना। विश्व के पहले व्हाइट टाइगर सफारी का 3 अप्रैल को शुभारंभ होने जा रहा है। आइए, जानते हैं कैसे मांद का जंगल वक्त के साथ बदलता गया। वन परिक्षेत्र मुकुंदपुर बाघों के लिए प्राकृतिक अनुकूलता से भरा है। यहां की आरक्षित वन भूमि सफेद बाघों के लिए प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि भारत का पहला सफेद शेर विंध्य में देखा गया। यहां वह सब मौजूद है जो बाघों के वातावरण के लिए होना चाहिए।


65 साल पहले मिला था पहला बाघ
सीधी के जंगलों के बीच डेवा गांव है। जहां रीवा के तत्कालीन महाराजा मार्तंड सिंह ने अतिथि महाराजा अजित सिंह के सम्मान में 27 मई 1951 को आखेट कैंप लगाया था। पास ही पनखोरा के जंगल में नाले के किनारे गुफा है। जहां मार्तंड सिंह ने सबसे पहले एक सफेद बाघ देखा। उसे पकड़कर गोविंदगढ़ किला में ले आए। जंगल से जिंदा पकड़ा जाने वाला संभवत: आखिरी सफेद बाघ था।


मोहन तथा राधा की संतति
वन विशेषज्ञों की मानें तो सफेद बाघ शावक सबका मन मोह रहा था। इसलिए नाम मोहन रखा गया। मोहन से प्रथम बार बंदी अवस्था बाघों का प्रजनन प्रारंभ हुआ। फिर गोविंदगढ़ विश्व में सफेद बाघों के प्रथम बंदी प्रजनन केन्द्र के रूप में विख्यात हुआ। आज विश्व में जीवित समस्त सफेद बाघ 'मोहन तथा राधा' की संतति हैं। 19 वर्षों तक गोविंदगढ़ के राजमहल में शानोशौकत के साथ सफेद बाघों का परिवार बढ़ाने वाले मोहन की 18 दिसंबर 1969 को मृत्यु हो गई।

और जब खो गया विराट का इतिहास
वन विभाग की मानें तो जुलाई 1976 में गोविंदगढ़ में अंतिम सफेद बाघ 'विराट' की मृत्यु के साथ ही विंध्य में सफेद बाघ का इतिहास खो गया। विश्व के पर्यटन नक्शे में ढाई दशक तक छाए गोविंदगढ़ की रौनक भी छिन गई।

बन गया चुनावी मुद्दा
जानकारों ने बताया, सन् 1980 के बाद से 2003 तक जितने भी चुनाव हुए लोकसभा अथवा विधानसभा सभी में सफेद बाघों की वापसी चुनावी मुद्दा रहा। जनता का इनसे भावनात्मक लगाव है। इसलिए जनप्रतिनिधियों ने वापसी के प्रयास किए।

2009 की परिकल्पना 2016 में साकार
सफेद बाघों की वापसी के लिए व्हाइट टाइगर सफारी का प्रस्ताव सन् 2009 में ऊर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ला ने प्रदेश और केन्द्र शासन को भेजा। उसकी स्वीकृति और अन्य औपचारिकताओं के अलावा बजट और बाघों की शिफ्टिंग के लिए प्रयासरत रहे। सफेद बाघों और टाइगर सफारी के लिए मांद के जंगल को चुना गया। इस तरह तमाम अवरोधों और झंझावातों के बाद आखिरकार 2009 की परिकल्पना को पंख लगे। और, सतत निगरानी में व्हाइट टाइगर सफारी का सपना अप्रैल 2016 में साकार हो गया।

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