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लकड़ी लेकर आती है यह ट्रेन, जानिए क्या है वजह

मानिकपुर पैसेंजर आते ही प्लेटफार्म में चारों ओर बिखर जाते हैं गठ्ठर। ट्रेन में जगह कम पड़ी तो कोच के बीच लाद दिए जाते है  

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सतना

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Rajiv Jain

Dec 11, 2017

manikpur satna passenger wooden train

Manikpur satna passenger wooden train

सतना. मानिकपुर से सतना और कटनी होकर इटारसी तक जाने वाली पैसेंजर ट्रेन अपने साथ लकडिय़ां लेकर आती है। आदिवासी अंचल से गुजरने वाली इस ट्रेन में गरीब आदिवासी महिलाएं लकडिय़ां बीनकर लाती हैं। इस लकड़ी को वो रास्ते में पडऩे वाले बड़े शहरों की लकड़ी मंडी में बेचती हैं।
सुबह से दोपहर के वक्त मानिकपुर से सतना आने वाली पैसेजर ट्रेन किसी मालगाड़ी से कम नहीं होतीं। इनमें यात्री सवार हो या न हो, लकड़ी के सैकड़ों गठ्ठर की लोडिंग-अनलोडिंग खूब होती है। यह एक दिन का हाल नहीं बल्कि रोज की कहानी है। मानिकपुर से सतना-कटनी होकर इटारसी जाने वाली पैसेंजर ट्रेनों की यही पहचान बन चुकी है। सतना स्टेशन मानिकपुर पैसेंजर आते ही एक घंटे के लिए लकड़ी की मंडी में तब्दील हो जाता है।
लकड़ी के गठ्ठरों से पैक पूरी ट्रेन जैसे ही सतना स्टेशन में आकर रुकती है तो चारों तरफ सिर्फ लकड़ी ही लकड़ी नजर आती है। यही नजारा रविवार को दोपहर सवा एक बजे का भी रहा। स्टेशन के प्लेटफॉर्म २ पर जैसे ही मानिकपुर-सतना-कटनी-इटरसी गाड़ी रुकी यहां अफरा-तफरी का माहौल बन गया। प्लेटफॉर्म ३ पर ठीक उसी समय लोकमान्य तिलक टर्मिनल-रांची एक्सप्रेस के आने से यात्रियों को प्लेटफॉर्म से बाहर निकलने में खासी परेशानी हुई। एक घण्टे बाद जब लकडि़यां लेकर आने वाली महिलाओं ने अपने-अपने गठ्ठर समेट लिए तब स्थिति सामान्य हुई। लेकिन उसके बाद भी पूरे प्लेटफॉर्म में कचरा बिखरा रहा।

‘इया रेल न चलई त भूखन मर जई’
लकड़ी लेकर सतना आने वाली गरीब आदिवासी महिलाओं में रेलवे व आरपीएफ की कार्रवाई का कोई खौफ नहीं है। इनका कहना है कि कोई भी पकड़े, लकडि़यां लाना बंद नहीं कर सकते क्योंकि परिवार चलाने का यही एकमात्र आधार है। पैसेंजर गाड़ी से रोजाना सतना आने वाली ललती ने बताया कि कई सालों से वह बहू व बेटियों के साथ सतना आकर लकड़ी बेचने का काम करती है। उससे जब पूछा गया कि ट्रेन के अंदर या स्टेशनों में कोई लकड़ी ले जाने के एेवज में पैसा मांगता है तो उसने कुछ जवाब नहीं दिया। कहा, इया रेल न चलय त भूखन मर जई, पूर दिन के मेहनत मा सौ दु सौ मिल जाथे, एही छोड़ अवर कउनव काम नहीं आय।

जहां जगह मिली ठूस दी लकड़ी
अनुमान के अनुसार मानिकपुर पैसेंजर से रोजाना करीब ५०० गठ्ठर लकड़ी सतना स्टेशन में उतारी जाती है जो मानिकपुर व मझगवां के बीच पडऩे वाले हर स्टेशन में लादी जाती है। यह लकड़ी ट्रेन के सीट से लेकर हर कोने में भरी जाती है। १२ डिब्बों की ट्रेन में शायद ही कोई एेसी जगह बचती हो जहां पर लकडि़यां न भरी हुई हों। कोच के अंदर गेट से लेकर सीट के नीचे व बाथरूम तक में गठ्ठर रखे होते हैं। जब लकड़ी रखने के लिए ट्रेन में कहीं कोई जगह नहीं बचती तो दो कोच के ज्वांइट में एक के ऊपर एक गठ्ठर जमा दिए जाते हैं।

स्टेशन में भी हो जाता है सौदा
पैसेंजर ट्रेन के आने से पहले ही कई बार लकडि़यों के खरीदार स्टेशन पहुंच जाते हैं। इसके चलते यहीं पर ही लकडि़यों का सौदा हो जाता है। खरीदी करने वाले लोग प्लेटफॉर्म दो के प्रेमनगर छोर की ओर इंतजार करते हैं क्योंकि महिलाएं ट्रैक पार कर रेलवे कॉलोनी होते हुए प्रेमनगर की ओर लकड़ी लेकर जाती हैं।

कार्रवाई में आड़े आ रही मानवता!
पैसेंजर गाड़ी में रोजाना सैकड़ों गठ्ठर लकड़ी चढ़ाने-उतारने से सवारियों को काफी दिक्कत झेलनी पड़ती है। पूरी ट्रेन में लकडि़यां होने से स्टेशन में चढऩे उतरने से लेकर बाथरूम तक जाने में खासी परेशानी होती है। एेसा नहीं है कि लकड़ी लेकर आने वाली महिलाओं पर कार्रवाई नहीं होती। आरपीएफ समय-समय पर कुछ लोगों की लकडि़यां जब्त कर जुमार्ना भी वसूलती है। जानकारों के अनुसार कई बार मानवता के नाते लकड़ी लेकर आने वाली महिलाओं पर कार्रवाई नहीं की जाती।