
सतना जिले का नागौद किले की भी कुछ ऐसी ही कहानी है
लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद भले ही ज्यादातर राजघराने सियासी तौर पर हाशिए पर आ गए हों, लेकिन प्रदेश में कुछ इलाके आज भी ऐसे हैं जहां की सत्ता व सियासत में पूर्व राजघरानों का ही अच्छा खासा दखल रहा है। चाहे गुना का राघोगढ़ हो या ग्वालियर किला। सतना जिले का नागौद किले की भी कुछ ऐसी ही कहानी है।
नागौद विधानसभा सीट पर आजादी से अब तक हुए 13 चुनाव में से 10 बार सीधे तौर पर राजघरानों से संबंधित लोग ही चुनकर सदन पहुंचे हैं। इस सीट पर ज्यादातर किले और गढ़ी के बीच ही सियासी संग्राम हुआ। इसमें स्थिति सिंह इज किंग की रही।
नागौद सीट की कहानी
नागौद विधानसभा सीट की कहानी भी रोचक है। 1951 के चुनाव में नागौद विधानसभा क्षेत्र था। यहां से गोपाल शरण सिंह विधायक चुने गए। हालांकि 1957 का चुनाव आते-आते इस सीट को खत्म कर दिया गया। तब गोपाल शरण सिंह मैहर से लड़े और जीते। 1962 में नागौद के बजाय उचेहरा को विधानसभा क्षेत्र बनाया गया। तब आरक्षित रही इस सीट पर जनसंघ के गयादीन जीते। 1967 के चुनाव में उचेहरा का विलय कर नागौद को फिर विधानसभा क्षेत्र बनाया गया। तब आरक्षित रही इस सीट पर बाला प्रसाद दो बार (1967 और 72 में) कांग्रेस की टिकट पर जीते। 1977 में आरक्षण समाप्त होते ही किले और गढ़ी की लड़ाई शुरू हुई। नागौद स्टेट के वारिस नागेंद्र सिंह के नाम सर्वाधिक पांच बार विधायक बनने का रेकॉर्ड है। लेकिन इस बार (2023) के चुनाव में नागेंद्र सिंह ने लडऩे से इनकार किया है तो भाजपा को जिताऊ प्रत्याशी खोजने में पसीना छूट रहा है। नागेंद्र सिंह के अनुज रामदेव सिंह भी एक बार यहां से विधायक बने। यहां की सियासत में राजपरिवार के अलावा पतौरा गढ़ी का भी अच्छा खासा दखल रहा है। इस परिवार के सदस्य रामप्रताप सिंह यहां से तीन बार विधायक चुने गए। 1998 में कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय विधायक बनकर उन्होंने सबको चौंका दिया था। उस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रहे राजाराम त्रिपाठी की जमानत जब्त हो गई थी।
भाजपा ने किसी और को नहीं दिया मौका, कांग्रेस बदलती रही चेहरे
सीट पर भाजपा ने 1977 के बाद नागेंद्र सिंह पर ही भरोसा जताया, जबकि जीत की कोशिश में कांग्रेस हर बार चेहरा बदलने की कोशिश करती रही। 1977 से 2013 तक राजपरिवार और पतौरा गढ़ी के सदस्य ही आमने-सामने होते रहे हैं। भाजपा ने तो किसी और को मौका ही नहीं दिया। 2013 में नागेंद्र सिंह ने चुनाव न लडऩे की घोषणा की तो भाजपा ने उनके प्रतिद्वंद्वी पतौरा परिवार के सदस्य गगनेंद्र प्रताप सिंह को मैदान में उतार दिया। तब कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह ने उन्हें करीब 10 हजार मतों के अंतर से चुनाव हरा दिया था। पांच साल बाद 2018 में भाजपा ने फिर नागेंद्र को प्रत्याशी बनाया तो कांग्रेस के यादवेंद्र मामूली अंतर से चुनाव हार गए।
93 में तीसरी ताकत बनकर उभरी बसपा भी बेअसर रही
इस सीट पर 1993 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी तीसरी ताकत बनकर उभरी और लड़ाई को कभी त्रिकोणीय तो कभी चतुष्कोणीय बनाने में कामयाब रही। लेकिन बसपा प्रत्याशी कभी जीत तो दर्ज नहीं कर पाए। वे 10 से 22 फीसदी वोट लेकर चुनाव परिणामों को जरूर हमेशा प्रभावित करते रहे हैं। पार्टी का यहां मजबूत आधार करीब 10-12 फीसदी दलित वोट हैं, जो हमेशा ही उसके साथ ही रहते हैं।
ऐसा है जातीय समीकरण
करीब 2.40 लाख मतदाता वाली सीट में सर्वाधिक आबादी ओबीसी की है, लेकिन बिखराव के चलते कभी प्रभावी भूमिका में नहीं होते। क्षेत्र में ब्राह्मण और एससी-एसटी मतदाता भी अच्छे खासे हैं। जातिवार बात करें तो सर्वाधिक संख्या ब्राह्मण मतदाताओं की है। इसके अलावा करीब 30 हजार कुशवाहा, लगभग इतनी ही संख्या में आदिवासी और दलित मतदाता हैं। क्षेत्र की सियासत में दबदबा रखने वाले क्षत्रिय व वैश्य समाज के मतदाता 12 फीसदी और 15 से 17 हजार कुर्मी मतदाता हैं, जो एकजुटता के साथ अपना असर दिखाते रहे हैं।
भौगोलिक समीकरण
क्षेत्र की सियासत में जातीय संतुलन के साथ क्षेत्रीय समीकरण भी काफी प्रभावी माने जाते हैं। सीट को सियासी तौर पर तीन तरीके से साधा जाता है। पहला नागौद व उचेहरा का कस्बाई इलाका। दूसरा इनसे लगी पंचायतें और तीसरा परसमनिया पठार की 16 पंचायतें। तीनों इलाकों की अपनी-अपनी अलग जरूरतें व मुद्दे हैं। उचेहरा व नागौद का कस्बाई इलाका अपेक्षाकृत सुविधा संपन्न है। यहां लोगों की जरूरतें बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन व कानून व्यवस्था रहती है। इनसे लगी पंचायतों में खेती-किसानी, उपज का उचित मूल्य के साथ शिक्षा-स्वास्थ्य व परिवहन व्यवस्था भी प्राथमिकता में रहती है। लेकिन परसमनिया पठार की 16 पंचायतों में बुनियादी सुविधाओं के साथ शिक्षा की कमी है। खनिज संपदा व प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र में पिछले एक दशक में सड़कों का जाल तो बिछा दिया गया है, लेकिन बहुतायत मात्रा में रहने वाले यहां के आदिवासी परिवार आज भी बेरोजगारी व लाचारी का दंश झेल रहे हैं।
यादवेंद्र ही भेद पाए सियासत का अभेद्य किला
क्षेत्र में अब तक 13 चुनाव हुए हैं। इनमें छह बार कांग्रेस और पांच बार भाजपा को जीत मिली। एक बार निर्दलीय और एक बार जनता पार्टी के विधायक चुने गए। मतदाताओं ने सर्वाधिक पांच बार नागेंद्र सिंह और एक बार उनके अनुज रामदेव सिंह को अपना प्रतिनिधि चुना है। तीन बार पतौरा गढ़ी के रामप्रताप सिंह व एक बार उनके चाचा गोपालशरण सिंह को विधायक बनाया। रामप्रताप सिंह दो बार तो कांग्रेस के सिंबल पर जीते, लेकिन 1998 के चुनाव में निर्दलीय विधायक बनकर सबको चौंका दिया था। सियासत का अभेद्य माना जाने वाला किला केवल एक बार 2013 में कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह तोड़ पाए हैं। 1955 से 1972 तक यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रही। तब कांग्रेस के बाला प्रसाद दो बार विधायक चुने गए। वह रैगांव की मौजूदा विधायक कल्पना वर्मा के परिवार से आते हैं।
अब तक के विधायक
वर्ष विधायक पार्टी
1951 गोपाल शरण सिंह कांग्रेस
1967 बाला प्रसाद कांग्रेस
1972 बाला प्रसाद कांग्रेस
1977 नागेंद्र सिंह जनता पार्टी
1980 नागेंद्र सिंह भाजपा
1985 राम प्रताप सिंह कांग्रेस
1990 राम प्रताप सिंह कांग्रेस
1993 राम देव सिंह भाजपा
1998 राम प्रताप सिंह निर्दलीय
2003 नागेंद्र सिंह भाजपा
2008 नागेंद्र सिंह भाजपा
2013 यादवेंद्र सिंह कांग्रेस
2018 नागेंद्र सिंह भाजपा
Published on:
14 Oct 2023 10:17 am

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