
mp farmers shun soya bean farming, here are the reasons why
सुखेंद्र मिश्र @ सतना। 80 के दशक में विंध्य के किसानों की माली हालत सुधारने वाली नकदी फसल व पीला सोना के नाम से चर्चित सोयाबीन की खेती अब किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है। साल-दर-साल हो रहे नुकसान से कर्ज में डूबे विंध्य प्रदेश के सबसे अधिक सोया उत्पादन वाले सतना जिले के किसानों ने इसकी खेती से मुंह मोड़ लिया है।
इससे विंध्य में सोयाबीन के क्षेत्रफल में तेजी से गिरावट आई है। जिले में कभी 85 हजार हेक्टेयर में बोई जाने वाली सोयाबीन की फसल का रकबा घटकर महज 10 हजार हेक्टेयर में सिमट गया है। स्थिति यह है कि सोयाबीन उत्पादन में मालवा को टक्कर देने वाले जिले में स्थित सोया प्लांटों को अब दूसरे राज्यों से उपज मंगानी पड़ रही है।
क्यों घट रहा रकबा
जिले के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है, लगातार तीन दशक से सोयाबीन की खेती से जिले की जमीन की उत्पादन क्षमता तेजी से गिरी है। 80 व 90 के दशक में जिले के किसानों की माली हालत सुधारने वाले सोयाबीन की बीते एक दशक में बोवनी लागत बढ़ी है, लेकिन उत्पादन लगातार घटा। इससे इस फसल से किसानों के लिए लागत निकालना मुश्किल हो गया है। कभी मौसम की मार तो कभी भाव कम मिलने से सोयाबीन की खेती करने वाले किसान लगातार कर्ज में दबते जा रहे हैं। इसलिए जिले के किसानों ने अब सोयाबीन की खेती का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है।
10% कम हुआ उत्पादन, भाव आधे
विंध्य के किसानों ने खरीफ की प्रमुख फसल सोयाबीन की खेती से तौबा कर सरकार की योजना पर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसानों का कहना है, आधुनिक तकनीक से बोवनी करने से सोयाबीन की खेती की लागत बढ़ी है। जबकि इसका उत्पादन घट कर आधा रह गया है। उत्पादन कम होने के साथ ही मंडियों में सोयाबीन के दाम भी घट कर आधे हो गए हैं। इससे खेती करने वाले किसानों की लागत नहीं निकल पा रही।
सोयाबीन के लिए मौसम अनुकूल नहीं है। प्राकृतिक आपदा के चलते किसान को हर साल घाटा हो रहा है। इसलिए सोयाबीन की बोवनी में कमी आई है। कृषि विभाग सोयाबीन के विकल्प के रूप में दलहन की खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहन दे रहा है।
आरएस शर्मा, उप संचालक कृषि सतना
Published on:
19 Jul 2018 05:05 pm
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