
समाजसेवी नानाजी देशमुख
सतना. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सरकार ने तीन हस्तियों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने का ऐलान किया है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, जनसंघ नेता नानाजी देशमुख (मरणोपरांत) और असमिया गायक और कवि डॉ. भूपेन हजारिका (मरणोपरांत) को भारत रत्न प्रदान किया जाएगा। नानाजी देशमुख का मध्यप्रदेश के सतना जिले से खास रिश्ता है। उन्होंने चित्रकूट को अपनी कर्मभूमि बनाया और अंत तक यहीं रहे। नाना जी अंतिम समय तक सतना के चित्रकूट से जुड़े रहे। जहां उन्होंने दिनदयाल शोध संस्थान व ग्रामोदय विवि की स्थापना की। जीवन के अंतिम समय तक चित्रकूट में रहकर समाज सेवा में लगे रहे। उन्हें कर्मयोगी व राष्ट्र ऋषि का दर्जा प्राप्त रहा। 27 फरवरी 2010 को निधन हुआ।
महाराष्ट्र में जन्म
नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के हिंगोली जिले के कडोली गांव में हुआ था। इस छोटे से कस्बे में मराठा परिवार में 11 अक्टूबर 1916 को जन्मे थे। उनका जीवन अभाव और संघर्षों में बीता। उन्होंने छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया। मामा ने उनका लालन-पालन किया। उनके पास शुल्क देने और पुस्तकें खरीदने तक के लिए पैसे नहीं थे। किन्तु उनके अन्दर शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति की इच्छाशक्ति रही। जिसके लिए उन्होंने सब्जी बेचकर पैसे जुटाए। वे मन्दिरों में रहे और पिलानी के बिरला इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा प्राप्त की। बाद में उन्नीस सौ तीस के दशक में वे आरएसएस में शामिल हो गये। बाद में राजस्थान, उत्तर प्रदेश होते हुए मध्य प्रदेश पहुंचे। उसके बाद वे मप्र के ही होकर रह गए।
किया था देहदान
उन्होंने देहदान का संकल्प पत्र बहुत पहले ही भर दिया था। उनके देहांत के बाद पार्थिव शरीर आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली को दान दे दिया। बताया जाता है कि नानाजी ने सन् 1997 में इच्छा जताई थी कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी देह का उपयोग चिकित्सा शोध कार्य के लिए किया जाए। उनकी इच्छा पर विचार करते 11 अक्टूबर 1997 को देहदान की एक वसीयत तैयार की गई। जिस पर उन्होंने साक्षी के रूप में कुमुद सिंह व हेमंत पाण्डे की उपस्थिति में हस्ताक्षर किए थे। दोनों को नानाजी पुत्र व पुत्री मानते थे।
Published on:
25 Jan 2019 10:26 pm
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