
एक डॉक्टर पर सतना जिले के दांतों की देखभाल का जिम्मा
सतना. जिले में दंत रोगियों संख्या लगातार बढ़ रही है। जिला अस्पताल की ओपीडी में हर माह 900 से 1000 मरीज दंत रोग से ग्रसित पहुंच रहे हैं। प्रतिदिन करीब 35 से 40 मरीज पहुंच रहे हैं। पीडि़तों का ग्राफ हर माह तेजी से बढ़ा रहा है पर चिकित्सक के पद खाली हैं। जिला अस्पताल आने वाले इन मरीजों का भार महज एक चिकित्सक पर है। प्रबंधन को मजबूरी में निजी चिकित्सक की सेवा लेनी पड़ रही है। रोगियों की संख्या अधिक होने से कई को बिना उपचार के ही लौटना पड़ जाता है, तो कुछ निजी क्लीनिक का रुख करते हैं।
निजी चिकित्सक की ले रहे सेवा
दंत चिकित्सा ओपीडी में रोगियों के दिनोंदिन बढ़ते भार को एक चिकित्सक सहन नहीं कर पाता है। इस कारण जिला अस्पताल प्रबंधन को मजबूरी में निजी चिकित्सक की सेवा लेनी पड़ रही है। डॉक्टर देवेश गौतम यहां करीब चार माह से निजी चिकित्सक के रूप में सेवा दे रहे हैं।
इसके रोगी सबसे ज्यादा आ रहे
जिला अस्पताल ओपीडी में दांतों में ठंडा-गरम लगना, कीड़ा लगना (कैविटी), पायरिया (मसूड़ों से खून आना), सांस में बदबू, मसूड़ों में सूजन, दांतों का बदरंग होना जैसी बीमारियों के पीडि़त पहुंच रहे हैं। सबसे ज्यादा पीडि़त कीड़ा लगना (कैविटी), पायरिया (मसूड़ों से खून आना) के आ रहे हैं। इसमें बच्चे और युवा वर्ग के पीडि़तों की संख्या सर्वाधिक है।
निजी चिकित्सक से सेवा लेने को मजबूर जिला अस्पताल प्रबंधन
सिविल अस्पताल व सीएचसी में भी पद खाली
दो पद स्वीकृत, एक खाली
जिला अस्पताल में दंत रोग विशेषज्ञ और दंत शल्य चिकित्सक के दो पद स्वीकृत हैं। लेकिन पदस्थापना महज दंत रोग विशेषज्ञ की है। दंत शल्य चिकित्सक का पद सालों से खाली पड़ा हुआ है। शल्य चिकित्सक के अभाव में पीडि़तों को अस्पताल में उपचार नहीं मिल पाता। ऐसे में वे निजी चिकित्सा संस्थान जाते हैं। इस कारण जेब पर भी भार पड़ता है। क्योंकि उनसे मनमानी शुल्क लेकर चिकित्सा मुहैया कराई जाती है।
दिलीप मंथानी कृष्णनगर में रहते हैं। मंगलवार को वे दांतों का इलाज कराने जिला अस्पताल पहुंचे। दिलीप ने बताया कि मसूड़ों में विगत छह महीने से समस्या है। पहले निजी क्लीनिक में उपचार कराया पर आराम नहीं मिला। अब जिला अस्पताल दिखाने आए हैं।
गुणदीप सिंह पंजाबी मोहल्ले के रहने वाले हैं। ये दांतों की कैविटी के शिकार हैं। शुरू में गुणदीप ने निजी क्लीनिक में उपचार कराया पर आराम नहीं मिला। मंगलवार को ये जिला अस्पताल पहुंचे और डॉक्टर को दिखाया।
सर्वे में चौंकाने वाला सच आया सामने
दांतों की साफ-सफाई को लेकर लोग बहुत ज्यादा जागरूक नहीं हैं। ब्रिटेन में हुए एक सर्वे में पता चला कि महज नौ प्रतिशत लोगों को ही लगता है कि मुंह के स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है। शोधकर्ताओं ने 2,000 वयस्क लोगों के बीच यह स्टडी की और पाया कि हर 3 में से 1 व्यक्ति ब्रश करना भूल जाता है। 10 में से एक का कहना था कि वे टूथपेस्ट करने की जगह चुइंग गम चबाकर अपने दांत साफ रखते हैं। 80 प्रतिशत ने माना कि वे मुंह की समस्याओं से गुजर रहे हैं।
इन बीमारियों को दस्तक
दांतों की समस्या को हल्के में नहीं लेना चाहिए। इसके कारण हमें कई बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। जो गंदगी हमारे दांतों में लगी रहती है वह भोजन के माध्यम से पेट तक जाती है और खून में मिल जाती है। ऐसे में हमें कई रोग घेर लेते हैं। अगर दांत पीले और सड़े हैं तो आपको भी ये रोग हो सकते हैं।
डायबिटीज
दांतों में पीलेपन की वजह से डायबिटीज की समस्या हो सकती है। डायबिटीज का मुख्य लक्षण दांतों में पीलापन, मुंह से बदबू आना आदि है। इस समस्या में मुंह में पाए जाने वाले लार में इन्फेक्शन हो जाता है और मसूड़े पूरी तरह से गल जाते हैं। इसलिए अगर डायबिटीज की समस्या से बचना है, तो अपने दांतों को सुरक्षित रखें।
हाई बीपी
उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) के रोगियों के दांत में कीड़े लगे रहते हैं। मसूड़ों से खून और बदबू भी आती है। इसलिए अगर आपको इनमें से कोई भी समस्या है तो आप उच्च रक्तचाप के शिकार हो सकते हैं।
हृदय रोग
दांत का दर्द बीमारी नहीं है। बल्कि यह बीमारी की शुरूआत का लक्षण है। दांत और मसूड़ों से हृदय का संबंध बहुत गहरा है। अगर दांतों की सफाई ठीक से न की जाए तो हार्ट अटैक आने का खतरा बढ़ जाता है।
दांत का दर्द बीमारी नहीं है। बल्कि यह बीमारी की शुरूआत का लक्षण है। दांत और मसूड़ों से हृदय का संबंध बहुत गहरा है। अगर दांतों की सफाई ठीक से न की जाए तो हार्ट अटैक आने का खतरा बढ़ जाता है।
फेफड़े
दांतों की बेहतर ढंग से सफाई न की जाए तो यह पीले पडऩे लगते हैं। इनमें कीड़े भी अपना घर बना लेते हैं। ऐसे में ये खून के साथ मिक्स हो जाते हैं और फेफड़ों तक जा पंहुचते हैं। फेफड़े खराब होने लगते हैं।
कैंसर
दांतों की समस्या जैसा छोटा रोग कैंसर जैसे बड़े रोग को जन्म दे सकता है। दांतों के कीट मुंह के लार में घुल जाते हैं। किसी भी चीज को खाने या पीने से यह गले से गुजरते हैं। इससे गले के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। दांतों की समस्या जैसा छोटा रोग कैंसर जैसे बड़े रोग को जन्म दे सकता है। दांतों के कीट मुंह के लार में घुल जाते हैं। किसी भी चीज को खाने या पीने से यह गले से गुजरते हैं। इससे गले के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
इन सुविधाओं का अभाव
दंत चिकित्सा ओपीडी में रूट कैनाल की सुविधा नहीं है। पीडि़तों का दांत जब आधा खराब होता है, संक्रमण या एप्सिस बनने लगता है तो उन्हें निजी क्लीनिक में उपचार कराना पड़ रहा है। फिलिंग और स्केलिंग की भी सुविधा नहीं है। इसके लिए भी पीडि़त निजी संस्थान के भरोसे रहते हैं।
निजी में खर्च हो रहे दो हजार रुपए
निजी क्लीनिक और संस्थानों ने रूट कैनाल, फिलिंग और स्केलिंग की अपने-अपने स्तर पर शुल्क तय कर रखी है। रूट कैनाल के लिए पीडि़तों को निजी चिकित्सा संस्थान में 1200 से 2000 रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। फिलिंग के लिए 500 से 1000 और स्केलिंग के लिए 500 से 1500 रुपए देने पड़ रहे हंै।
जागरूकता की कमी से बढ़ रही पीडि़तों की संख्या
जिला अस्पताल ओपीडी में प्रतिदिन 35 से 40 पीडि़त उपचार के लिए आते हैं। दंत रोगियों की संख्या लगातार बढऩे की मुख्य वजह है जागरूकता का अभाव। तंबाकू, बच्चों में जंकफू ड, चॉकलेट के अत्यधिक सेवन से भी यह संख्या लगातार बढ़ रही है। लोग जागरूकता के अभाव में खाने के बाद अच्छी तरह से दांत साफ नहीं करते। इससे खाने के अवशेष से बैक्टीरिया सल्फर कम्पाउंड बनाता है और सांस में बदबू हो जाती है। बदबू मुंह से अंदर, जीभ के पीछे वाले भाग और मसूड़ों के निचले हिस्से में बनती है। लोग जागरूक हों तो कुछ हद तक यह समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी।
Published on:
06 Mar 2019 04:50 pm
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