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200 करोड़ की सरकारी जमीन का नामांतरण बिना विधिक राय के अफसरों ने किया स्वीकार

पत्रिका में मामला उठने के बाद अफसरों की नींद टूटी अब राय के लिये दस्तावेज भेजे शासकीय अभिभाषक के पास    

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सतना. शहर की बेशकीमती सरकारी जमीन देखते देखते सरकारी अफसरों की मेहरबानी से निजी हो गई। जिन अधिकारियों पर सरकारी जमीनों की रक्षा की जिम्मेदारी थी उन्होंने ही अपनी जिम्मेदारियों को किनारे कर निजी हितों के लिये जुट गए और 200 करोड़ मूल्य की सरकारी जमीन को निजी हो जाने दिया। हद तो यह हो गई कि जब इस जमीन का मामला नामांतरण के लिये आया तो बिना विधिक सलाह लिये इतने बड़े सरकारी भू-खण्ड का नामांतरण भी तहसीलदार ने स्वीकार कर लिया। इस मामले में शासकीय अभिभाषक का कहना है कि अफसरों ने शासन हितों को ताक पर रखा है। अब जब पत्रिका ने मामले को प्रमुखता से उठाया है तो सोमवार की शाम को इस मामले में विधिक राय के लिये कुछ दस्तावेज इस जमीन से जुड़े शासकीय अभिभाषक के पास भेजे गए हैं।
सेमरिया चौक - अस्पताल तिराहा रोड से लगी कंवरराम टाकीज के सामने 32 एकड़ का स्टेट बांध जिसका आज की स्थिति में शासकीय मूल्य 200 करोड़ के लगभग है अब निजी हो चुका है। अफसरों की अनदेखी के कारण यह फैसला सुप्रीम कोर्ट से विलंब की वजह से निजी पक्ष के हक में आया है। स्पष्ट है कि मामले में अफसरों ने किस तरह से मलाई काटी है। बहरहाल इसके बाद जब निजी पक्ष ने इसके नामांतरण के लिये आवेदन लगाया तो तत्कालीन तहसीलदार को इतनी जल्दी रही कि उन्होंने इस मामले में शासकीय अभिभाषक से विधिक राय भी लेना उचित नहीं समझा और नामांतरण स्वीकार कर लिया। पत्रिका ने जब इस मामले में पड़ताल की तो सारा चिट्ठा सामने आ गया। इस मामले में शासकीय अभिभाषक रमेश मिश्रा का कहना है कि अव्वल तो यह पूरा मामला अफसरशाही की घोर लापरवाही का है। इसके बाद भी अगर नामांतरण के लिये अगर मामला आया था तो शासन की इतनी बड़ी जमीन का नामांतरण स्वीकार करने से पहले शासकीय अभिभाषक से राय अवश्य लेनी चाहिए थी।

अब भेजा शासकीय अभिभाषक के पास
शासकीय अभिभाषक रमेश मिश्रा ने बताया कि पत्रिका में मामला उठने के बाद सोमवार की शाम को 32 एकड़ की जमीन के दस्तावेज राय लेने के लिये भेजे गये हैं। उन्होंने कहा कि अभी इस मामले को गंभीरता से देखना होगा उसके बाद ही शासन हित के मद्देनजर कोई निष्कर्ष निकाला जा सकेगा।

तहसीलदार ने चुना बीच का रास्ता
पत्रिका पड़ताल में यह मामला सामने आया है कि नामांतरण के मामले में तत्कालीन तहसीलदार ने बीच का रास्ता अपनाया है। उन्होंने नामांतरण तो स्वीकार कर लिया है लेकिन अपने आदेश में यह भी उल्लेख कर दिया है कि जमीन सरकारी होने के कारण धारा 115(3) के तहत कलेक्टर की अधिकारिता है। स्पष्ट है कि उन्होंने अपने हिस्से का तो काम कर दिया लेकिन मामले को उलझा दिया।

तो ये हैं विकल्प
विधिक जानकारों का कहना है कि इस मामले में अभी भी विकल्प खुले हुए हैं। मसलन इस जमीन के मूल पक्षकार शेख बब्बू के निधन के बाद पहला जो मामला चल रहा था उसमें उनकी पत्नी सहित उनके सभी बेटे और बेटियां पक्षकार थे। लेकिन इसी मामले में दूसरा केस जिसमें निजी पक्ष जीता उसमें सिर्फ शेख बब्बू के लड़के और उनके बेटे पक्षकार बने लिहाजा यह पक्षकारों का असंयोजन का मामला बनता है। दूसरा बताया गया है कि सुप्रीम कोट से यह मामला गुण दोष के आधार पर निर्णीत न होकर विलंब की वजह से निर्णीत हुआ है। लिहाजा धारा 5 के तहत वापस शासन खड़ा हो सकता है। अंतिम विकल्प जनहित याचिका का है। क्योंकि यह शासन की जमीन है और जनता के बहुत से हित इसमें निहित हैं और पूर्व में इस जमीन को हाउसिंग बोर्ड भी मांग चुका है। लिहाजा जनहित याचिका भी इसमें लग सकती है।

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