आल्हा के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें कहीं 52 तो कहीं 56 लड़ाइयां वर्णित हैं। इस लोक महाकाव्य की गायिकी की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं। एक लोककवि के अनुसार, आल्हा-गायन में प्रमुख संगति वाद्य ढोलक, झांझ, मंजीरा आदि है। विभिन्न क्षेत्रों में संगति-वाद्य बदलते भी हैं। ब्रज क्षेत्र की आल्हा-गायकी में सारंगी के लोक-स्वरूप का प्रयोग किया जाता है, जबकि अवध क्षेत्र के आल्हा-गायन में सुषिर वाद्य का प्रयोग भी किया जाता है।