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इन गीतों को सुनकर खड़े हो जाएंगे रोंगटे, फडफ़ड़ाने लगेंगी भुजाएं

कहा जाता है, आल्हा ऊदल जैसा देवी भक्त दूसरा नहीं हो सकता है। ये जितने लड़ाकू और शक्तिशाली थे उतने ही बड़े देवी भक्त भी थे।

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Abha Sen

Sep 23, 2015

aalha

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सतना।आल्हा-ऊदल बड़े लड़ईया...से प्रसिद्ध पंक्तियां सुनने वालों को रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कहा जाता है कि आल्हा ऊदल जैसा देवी भक्त दूसरा नहीं हो सकता है। ये जितने लड़ाकू और शक्तिशाली थे उतने ही बड़े देवी भक्त भी थे। इनका अखाड़ा अब भी सतना जिले के मैहर में स्थित है। क्षेत्रीय लोग बताते हैं कि आल्हा और ऊदल दोनों इस अखाड़े में कुश्ती लड़ा करते थे।
इनके लोकगीत में जादू ऐसा कि देखते ही देखते चारो ओर न सिर्फ भीड़ इकट्ठी हो जाती है, बल्कि सुनने वालों के बाजू फड़कने लगते हैं-

रन में दपक -दप बोले तलवार,
पन-पन-पन-पन तीर बोलत है,
कह-कह कहे अगिनिया बाण,
कट-कट मुंड गिरे धरती पर
जोश भर देनेवाली इस गायिकी को आल्हा कहते है जब इस गायकी के बोल चरम पर होते हैं तो सुनने वाले की खून की गति बढ़ जाती है, देश पर बलिदान हो जाने की इच्छा बलवती हो जाती है, कहते है की इन गीतों के नायक आल्हा और ऊदल ने अपना सर्वस्व मातृभूमि को अर्पित कर दिया था।

आल्हा ऊदल 11 वीं सदी में चंदेल शासक के सेनानायक थे, जिनकी वीरता का वर्णन कालिंजर के परमार राजाओं के दरबारी कवि जयनिक ने गेय काव्य के रूप में किया है। इन्होने महोबे के विख्यात वीर आल्हा-ऊदल की कथा आल्हा नामक छंद में लिखी है। यह छंद इतना लोकप्रिय हो गया कि पुस्तक का नाम ही आल्हा पड़ गया। इसके बाद जो भी कविता इस छंद में लिखी गयी उसे आल्हा कहा जाने लगा। दोनों भाइयों आल्हा और ऊदल ने किस प्रकार अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए पृथ्वीराज से भीषण युद्ध किया था।
जगनिक के लोककाव्य आल्ह-खण्ड की लोकप्रियता देशव्यापी है. महोबा के शासक परमाल के शूरवीर आल्हा और ऊदल की शौर्य-गाथा केवल बुन्देलखण्ड तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों की बोलियों में भी विकसित हुईं। मुख्य रूप से यह बुन्देली और अवधी का एक महत्त्वपूर्ण छन्दबद्ध काव्य है, जिसे लगभग सन 1250 में लिखा गाया था। आल्हा लोक गाथा है, जिसे भारत के लगभग सारे हिंदी प्रदेश में गाया जाता है। हालांकि क्षेत्रीय भाषा का प्रभाव इन पर पड़ा है।
आल्हा के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें कहीं 52 तो कहीं 56 लड़ाइयां वर्णित हैं। इस लोक महाकाव्य की गायिकी की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं। एक लोककवि के अनुसार, आल्हा-गायन में प्रमुख संगति वाद्य ढोलक, झांझ, मंजीरा आदि है। विभिन्न क्षेत्रों में संगति-वाद्य बदलते भी हैं। ब्रज क्षेत्र की आल्हा-गायकी में सारंगी के लोक-स्वरूप का प्रयोग किया जाता है, जबकि अवध क्षेत्र के आल्हा-गायन में सुषिर वाद्य का प्रयोग भी किया जाता है।
आल्हा का मूल छन्द कहरवा ताल में होता है। प्रारम्भ में आल्हा गायन विलम्बित लय में होता है। धीरे-धीरे लय तेज होती जाती है। आल्हा गानेवाले गायक के पास एक ढोल होता है। गाने की गति ज्यों-ज्यों तीव्र होती जाती है, ढोल बजने की गति में वैसा ही परिवर्तन होता जाता है। आल्हा और ऊदल की अपार श्रद्धा और भक्ति से ही उन्हें देवी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। जिससे आज भी उनके मौजूद होने की कथाएं प्रचलित हैं।

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