
Satna Handicraft exhibition: Santosh Kumar Bansal success story hindi
सुरेश मिश्रा@सतना। रहेगा बांस और बजेगी बांसुरी, उडऩे लगी बांस की चिडिय़ा। इस लाइन को चरितार्थ किया है अमरपाटन निवासी शिल्पी संतोष कुमार बंसल ने। संतोष ने 30 साल पहले गांव से ही बांस की कारीगरी सीखी। शुरुआती दौर में बांस की टोकरी, झाडू आदि बनाते रहे। एक दिन उनकी कारीगरी पर हस्तशिल्प विकास निगम की नजर पड़ गई। फिर क्या विभाग ने प्रशिक्षण दिलाया। कुछ दिन बाद स्वंय की रूचि और लगन से संतोष एक अच्छे शिल्पी बन गए।
हस्तशिल्प विकास निगम ने देश और प्रदेश को कारीगरी दिखाने के लिए संतोष को अगरतला में 3 माह का प्रशिक्षण दिलाया। जहां उनके उत्पादों का पूरा देश कायल हो गया। धीरे-धीरे संतोष बांस के बने तकनीकी डिजाइनों से कलात्मक सामग्री तैयार करने लगे। आज वे एक करोड रुपए का इम्पायर स्वयं के दम पर खड़ा कर दिया है। जिसमे आधा सैकड़ा मजूदर कार्य करते हैं।
राष्ट्रपति केआर नारायणन दे चुके हैं पुरस्कार
संतोष ने बताया कि उनकी कारीगरी में उस समय और चमक आ गई जब सन् 2000 में राष्ट्रपति केआर नारायणन ने अपने हाथों से दिल्ली के प्रगति मैदान में पुरस्कार दिया। हमारी सफलता की कहानी सुनने के बाद खुद सतना के तत्कालीन कलेक्टर टी धर्माराव, रीवा कमिश्नर गोयलजी, हस्तशिल्प विकास निगम की पीएस बीनू सिंह अमरपाटन स्थित हमारे घर पर आई। जहां सभी अधिकारी बांस के शिल्प को देखकर कायल हो गए। राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए चयनित होने पर सतना कलेक्टर, कमिश्नर खुद दिल्ली लेकर गए थे।
बांस से बना रहे 1 हजार से ज्यादा शिल्प
प्रदर्शनी में हस्तशिल्प विकास निगम के सहायक प्रबंधक गोविंद दास आगरे, सहयोगी शिवशंकर पाण्डेय, सुनील कोष्ठा, सुरेश सेन ने बताया कि वर्तमान समय में संतोष बंसल खुद घर से एक हजार से ज्यादा शिल्प तैयार कर रहे हैं। जिसमें चिडिय़ा के अंडे से लेकर, भागवत का पंडाल, ईयर रिंग, अंगूठी सहित तमाम तरह की बांस की ज्वेलरी, सोफा बेड से लेकर आलमारी, टेबल लैंप से लेकर आर्टीफिशियल बल्ब, टोकरी से लेकर कटोरी सहित हजारों उत्पाद देशी और असम के बांस को ट्रीटमेंट कर बनाते हैं।
Published on:
09 Feb 2020 01:32 pm
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