26 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मुसाफिरों की पहुंच से दूर जनता भोजन, गरीब यात्रियों को नहीं होता नसीब

हकीकत: स्टेशन के डेढ़ दर्जन स्टॉलों को मिलाकर भी नहीं मिल पाता 10 पैकेट खाना, जिस स्टॉल में जीएम ने चखा था खाना, वहां खानापूर्ति के लिए रखे जाते हैं दो पैकेट

3 min read
Google source verification

सतना

image

Suresh Mishra

Aug 11, 2018

satna railway station Janta Bhojan big news in hindi

satna railway station Janta Bhojan big news in hindi

सतना। रेलवे स्टेशन पर गरीब यात्री 15 रुपए में पेट नहीं भर सकता। उसे या तो 40-50 रुपए खर्च कर खाना खरीदना पड़ता है या फिर समोसे-भजिए से काम चलाना पड़ता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि रेलवे द्वारा सस्ते दर पर परोसा जाने वाला जनता खाना मुसाफिरों की पहुंच से दूर हो चुका है। यहां के फूड स्टॉल व ट्रॉली में मिलने वाला 15 रुपए का जनता खाना खुशकिस्मत यात्री को ही नसीब हो पाता है।

स्टेशन पर मौजूद खानपान स्टॉल संचालक जानबूझकर खाना नहीं रखते। मजबूरी में यात्रियों को महंगा खाना खरीदकर खाना पड़ता है। सस्ते की जगह महंगा खाना बेचने का यह खेल अधिकारियों की नाक के नीचे चल रहा है पर अफसरों ने आंख बंद कर रखी है।

अवैध वेंडर भी एक बड़ा कारण
प्लेटफॉर्म नंबर 1 से 3 तक जितने रिफ्रेशमेंट रूम और खानपान स्टॉल हैं उन पर जनता खाना रखना अनिवार्य है। लंबी दूरी की ट्रेनों में सफर करने वाले गरीब और मजदूर वर्ग से जुड़े यात्रियों को भूखा ना रहना पड़े और कम खर्च में उनका काम चल जाए, इसलिए कॉउंटरों पर जनता खाना रखना अनिवार्य है। पर, यहां नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। एक वैध वेंडर ने बताया कि ट्रेन व स्टेशन पर अवैध वेंडरों की भरमार के चलते जनता खाना फेल हो गया है। अवैध वेंडर ट्रेन में ही अपना खाना बेच चुके होते हैं, इसलिए यात्री स्टेशन में जनता खाना नहीं मांगते।

ठेकेदारों ने जीएम की आंख में झोंकी धूल
जनता खाना भले ही रेलवे की प्रमुख प्राथमिकता में शामिल है पर यहां के ठेकेदार अधिकारियों के निर्देश को ठेंगे पर रखते हैं। स्टेशन के तीनों प्लेटफॉर्म पर होटल, स्टॉल व ट्रॉली मिलाकर खाने के करीब डेढ़ दर्जन ठीहे हैं लेकिन ये 10 पैकेट भी जनता खाना नहीं रखते। पत्रिका ने जब स्टेशन पर जायजा लिया तो पाया कि ज्यादातर स्टॉल-ट्रॉली कभी भी जनता खाना नहीं रखते। एक-दो स्टॉल वाले खानापूर्ति के लिए दो-तीन पैकेट रख लेते हैं, वह भी अंदर।

आंख में धूल झोंकने के लिए निरीक्षण

दिलचस्प बात यह है कि जोन या मंडल स्तर के अधिकारियों की आंख में धूल झोंकने के लिए निरीक्षण के दौरान ठेकेदार सभी स्टॉलों में जनता खाना के पैकेट रखवा देते हैं। 28 जुलाई को पश्चिम मध्य रेल के जीएम सुनील सिंह सोइन के निरीक्षण के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ था। उन्होंने निरीक्षण में सबसे पहले जनता खाना की जानकारी लेकर एक पैकेट की पूड़ी-सब्जी चखी थी। अब हालात यह हैं कि जीएम ने जिस स्टॉल पर जनता पैकेट खोलकर चखा था वहां महज एक-दो पैकट ही रखे जाते हैं।

एेसा होता है जनता खाना
रेलवे ने जनता खाना के लिए एक मेन्यू निर्धारित किया है। उसी आधार पर ही जनता खाना के पैकेट तैयार होते हैं। एक पैकेट में निर्धारित नियम के हिसाब से 7 पूड़ी वजन 175 ग्राम, आलू की सूखी सब्जी 150 ग्राम, अचार 15 ग्राम और 1 मिर्च होना चाहिए। पैकेट की कीमत 15 रुपए निर्धारित की गई है, ताकि आम यात्री सहजता से खरीद सके। खाना स्टॉल में सामने होना चाहिए।

ऐसी है हकीकत
प्लेटफॉर्म 1: मथुरा प्रसाद एंड संस स्टॉल 1
खानपान के सबसे पुराने ठीहे पर भी जनता खाना सहज उपलब्ध नहीं है। यहां मौजूद वेंडर से जब एक पैकेट खाना मांगा गया तो उसने कहा कि अभी दूसरा कर्मचारी आएगा और वो ही देगा। करीब एक घंटे बाद जब दोबारा जनता खाने की मांग की गई तो दूसरे कर्मचारी ने पूछा कितने पैकेट चाहिए। जब पैकेट की उपलब्धता पर पूछा गया तो उसने बताया कि दो हैं। जनता खाना हमेशा क्यों नहीं रखने पर बोला कि बिकता नहीं है, जिसे जितना चाहिए होगा इंतजाम हो जाएगा। यह वही स्टॉल है जहां रेलवे जीएम ने डीआरएम व एडीआरएम सहित जनता खाने की गुणवत्ता की परख पूडी-सब्जी चखकर की थी।

प्लेटफॉर्म 1: स्टॉल 3, यहां मिले पैकेट
प्लेटफॉर्म एक पर ही आरओबी के पास मौजूद स्टॉल 3 में जनता खाना के पैकेट रखे हुए थे। स्टॉल में मौजूद वेंडर ने बताया कि खाना रखते हैं लेकिन डिमांड कम है। उसने बताया कि हर दिन दोपहर 12 बजे खाने के पैकेट आते हैं और जरूरत के हिसाब से रखे जाते हैं।

प्लेटफॉर्म 2 व 3 : किसी भी फूड स्टॉल पर पैकेट नहीं
प्लेटफॉर्म 2 व 3 पर बड़ी गाडि़यों सहित पैसेंजर गाडि़यां भी खड़ी होती हैं पर यहां के स्टॉलों से जनता खाना नदारत रहता है। एक स्टॉल वेंडर ने बताया कि पहले रखते थे लेकिन उम्मीद के मुताबिक बिक्री नहीं होती। अब सिर्फ भीड़भाड़ वाले सीजन में रखते हैं।