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युवतियों को चाहिए मनचाहा वर तो पहुंचे गैवीनाथ मंदिर, फिर करें भगवान शिव और माता पार्वती का गठजोड़

- जिलेभर के शिवमंदिरों में उमड़ा आस्था का सैलाब- गैवीनाथ धाम में हर वर्ष लगता है 30 दिवसीय सावन मेला- विधि-विधान से कराया जाता है पार्वती विवाह- सुबह से देर रात तक चलता रहता है कथा का दौर- श्रावण मास में कई भक्त शंकर पूजा के बाद करते है भंडारा

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Savan 2019: Satna birsinghpur shiv mandir story Gavinath Dham wishes

Savan 2019: Satna birsinghpur shiv mandir story Gavinath Dham wishes

सतना। शिव आराधना का महापर्व सावन मास १७ जुलाई से शुरू हो गया है। श्रावण मास के पहले सोमवार को भक्तों की आस्था उमड़ पड़ी। भोर ४ बजे से ही लंबी लाइन लगी थी। बाबा भोल नाथ की एक झलक पाने के लिए विंध्य क्षेत्र के हजारों भक्त टूट पड़े। सब एक ही स्वर में बाबा के जयकारे लगाते गए। उमस भरी गर्मी के बीच भी श्रद्धालुओं को उत्साह कम नहीं हुआ। बिरसिंहपुर गैवीनाथ मंदिर में मध्यप्रदेश सहित बड़ी संख्या में पड़ोसी राज्य यूपी से भी भक्त पूजा-अर्चना के साथ कथा, दान-धर्म करने आते हैं। कहते है कि ज्यादातर भक्त मन्नत पूरी होने पर भगवान शिव और माता पार्वती का गठजोड़ाव (कपड़े से दोनों मंदिरों को जोडऩा) करते हैं। गठजोड़ाव की परम्परा वर्षों से कायम है।

मान्यता है, ऐसा करने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। संतान की प्राप्ति होती है और युवतियों को अच्छा वर मिलता है। मंदिर के पुजारी पंडित सोनू बताते हैं, गठजोड़ाव की परम्परा करीब 100 साल पुरानी है। महीने में चार से छह कार्यक्रम हो जाते हैं। इसमें कपड़ा, नारियल, पान-सुपारी, हल्दी की गांठ, जनेऊ, इत्र, भगवान को नया पहनावा (मखमली टोपा), आस्था अनुसार रुपए व माता पार्वती के लिए लाल जोड़ा, शृंगार का सामान लगता है।

ऐसा है मंदिर का इतिहास
बिरसिंहपुर स्थित यह मंदिर बाबा गैवीनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। इसका इतिहास काफी पुराना है। पद्म पुराण के पातालखंड में वर्णित कथानुसार, त्रेतायुग में देवपुर के राजा वीर सिंह अनन्य शिवभक्त थे। वे भगवान महाकाल को जल चढ़ाने के लिए हमेशा उज्जैन जाते थे। वृद्धावस्था में आने-जाने में असमर्थ हो गए तो भगवान महाकाल देवपुर (वर्तमान में बिरसिंहपुर) स्थित गैवी यादव के घर चूल्हे से निकलने लगे। लेकिन, गैवी की मां मूसल से ठोककर अंदर कर देती। तीन माह तक रोजाना कुछ इसी प्रकार चलता रहा। अंत में भगवान राजा के सपने में आए और कहानी बताई। इसके बाद उन्होंने गैवी और उसकी मां को बुलाकर जानकारी दी और वहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया। महाकाल के कहने पर ही भोलेनाथ का नाम गैवीनाथ पड़ा। स्थानीय स्तर पर इनकी पहचान महाकाल के उपलिंग के रूप में होती है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति महाकाल के दर्शन करने नहीं जा पाता, वह गैवीनाथ के दर्शन से उतना ही पुण्य पा सकता है।

मुगल शासक ने दिखाया था दुस्साहस
1701 ई. में मुगल शासक औरंगजेब यहां आया था। उसने भगवान गैवीनाथ की मूर्ति को खंडित करने के उद्देश्य से पांच टांकियां (मूर्ति पर हथौड़े से प्रहार) लगवाई थी। पहली टांकी से दूध की धारा, दूसरी से खून की, तीसरी से पस की, चौथी से शहद और पांचवीं से भंवर निकले थे। हालांकि उनसे जान बचाकर वह भाग गया था। औरंगजेब द्वारा लगवाई गईं टांकियों के निशान बने हैं। यही वजह है कि उप्र के लोग फटहा बाबा के नाम से जानते हैं।