20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Siyasat Flashback: 2018 में बदली विंध्य की राजनीतिक तस्वीर, ये दिग्गज हुए अस्त तो सूरज से दमके युवा

जनता ने 'जननेता' को नेता बना दिया

3 min read
Google source verification
Siyasat Flashback: 2018 me badli vindhya region ki tasveer

Siyasat Flashback: 2018 me badli vindhya region ki tasveer

सतना। सियासी दृष्टि से 2018 बड़ा बदलाव लेकर आया है। विंध्य की राजनीति में कुछ नए चेहरों का उदय हुआ तो कुछ राजनीतिक खिलाड़ी सियासत के सेमीफाइनल में आउट हो गए। जनता ने चौंकाने वाला परिणाम देकर 1996 का इतिहास दोहराया। चुरहट, अमरपाटन व गुढ़ में चर्चित चेहरों को मात मिली तो सतना, सेमरिया और चित्रकूट के लोगों को नया चेहरा रास आया। 2025 के संदर्भ में देखें तो युवा ही राजनीति की धुरी होंगे। देश के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भी नयी दृष्टि एवं विजन 2025 के माध्यम से युवाओं के लिए लक्ष्य दिया था।

विंध्य की राजनीति
70 के दशक की विंध्य की राजनीति गोविंद नारायण सिंह, अर्जुन सिंह के इर्द-गिर्द थी। 90 का दशक आते-आते श्रीनिवास तिवारी, इंद्रजीत सिंह पटेल तक पहुंच गई। 2000 तक हर्ष सिंह, अजय सिंह व सुंदरलाल तिवारी कद्दावर नेता बनकर उभरे। दिग्गजों ने विंध्य से ऊपर उठकर प्रदेश की राजनीति में अलग छाप छोड़ी। यह साल पूरी तरह से राजनीतिक था। वर्ष की शुरुआत होने के साथ ही सियासी घटनाक्रमों में तेजी से परिवर्तन हुआ। प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में कमलनाथ बड़े चेहरे के रूप में आए, तो उनके सहयोगी की भूमिका में युवा चेहरे के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया दिखाई दिए। लिहाजा, परिवर्तन विंध्य में भी हुआ।

ये दिग्गज हुए अस्त
जिलाध्यक्षों से लेकर प्रदेश संगठन तक में परिवर्तन का दौर चला। साल के आखिर में विधानसभा चुनाव ने विंध्य की राजनीति ही बदलकर रख दी। चुरहट से नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, गुढ़ से सुंदरलाल तिवारी, अमरपाटन से विस उपाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र सिंह, सतना से शंकरलाल तिवारी, नागौद से यादवेंद्र सिंह जैसे दिग्गज अस्त हो गए। ऐसी ही राजनीतिक उठा-पटक 1996 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिली थी। जब अर्जुन सिंह और वीरेंद्र कुमार सकलेचा जैसे नेताओं को जनता ने नकार दिया था। इस बार रीवा से राजेंद्र शुक्ला और मैहर से नारायण त्रिपाठी ही अपनी साख बचाने में कामयाब रहे। जनता ने विक्रम सिंह, दिव्यराज सिंह, सुभाष वर्मा, शरदेंदु तिवारी, सिद्धार्थ कुशवाहा और केपी त्रिपाठी जैसे नए चेहरों को मौका दिया। इन चेहरों को भविष्य में नकारा नहीं जा सकता।

1-अजय सिंह
अजय सिंह अपने पिता पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। पहली बार 1985 में विधायक बने थे। 1990, 1998, 2003, 2008 और 2013 में चुरहट से विधानसभा पहुंचे। 1993 के चुनाव में तत्कालीन सीएम सुंदरलाल पटवा के खिलाफ भोजपुर से चुनाव लड़ा। लेकिन, हार गए थे। इसके बाद दिग्विजय सरकार में पंचायत मंत्री बनाए गए थे। विपक्ष की सरकार बनने पर नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई। 2014 में लोकसभा चुनाव भी हार गए थे।

हार के बाद अब
छात्र जीवन से राजनीति में कदम रखने के बाद अजय सिंह कांग्रेस के अजेय योद्धा माने जाते रहे। पार्टी व प्रदेश की राजनीति में बड़ा कद है। लेकिन, हाल ही में मिली हार ने उन्हें सियासी रूप से धक्का दिया है। अजय इससे पहले भी दो चुनाव हार चुके है, लेकिन तब वे अन्य जिलों से चुनाव लड़े थे। इस बार वे पिता की पुस्तैनी सीट भी नहीं बचा पाए। हार की चर्चा न केवल विंध्य बल्कि प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी रही है।

2- डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह
डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह 1980 के चुनाव में अमरपाटन से जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे थे। भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता रहे पूर्व मंत्री स्व. रामहित गुप्ता को मात दी थी। 1993 में भी निर्वाचित हुए और दिग्विजय सरकार में राज्यमंत्री बने। 1996 में पर्यावरण व उद्योग मंत्री बनाए गए। 1998 में पिता शिवमोहन सिंह को चुनाव मैदान में उतारा वे भी जीत गए। 2003 व 2013 में भी विधायक बने।

हार के बाद नई राह की तलाश
तत्कालीन सीएम अर्जुन सिंह बैरिस्टर गुलशेर अहमद के विकल्प के रूप में डॉ. राजेंद्र सिंह को राजनीति में लेकर आए थे। तब वे कनाडा की एक कंपनी में पदस्थ थे। प्रदेश की राजनीति में उन्होंने अपनी एक अलग छाप छोड़ी। गत 40 साल से कांग्रेस और विंध्य में सियासत के बड़े खिलाड़ी माने जाते रहे। लेकिन, हाल ही में विधानसभा चुनाव में मिली हार से वे न सिर्फ स्तब्ध हैं बल्कि नई राह की तलाश में हैं। इससे पहले 2008 में भी रामखेलावन पटेल से हारे थे। उन्होंने लोकसभा चुनाव में भी भाग्य आजमाया था, पर सफलता नहीं मिली। अब तक वे 4 बार विधायक, दो बार मंत्री और एक बार विधानसभा उपाध्यक्ष रहे। अब फिर से पार्टी और संगठन में नई भूमिका की तलाश में हैं।

3- सुंदरलाल तिवारी
विंध्य के कद्दावर नेता रहे श्रीनिवास तिवारी के पुत्र सुंदरलाल तिवारी भी राजनीति में पिता के पदचिह्नों पर चलने का प्रयास किया। बेबाक बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं। सैनिक स्कूल से पढ़ाई की शुरुआत करने के बाद एलएलबी भी की। इसलिए कोई भी बयान जारी करने से पहले उसके नफे-नुकसान को भी जानते हैं। कई बार विरोधाभाषी बयानों के चलते घिरे भी लेकिन अपनी बात से पीछे नहीं हटे और तर्क भी देने का प्रयास किया।

मेहनत करनी होगी
हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में गुढ़ से करारी हार का सामना करना पड़ा। ये मुकाबले से बाहर तीसरे स्थान पर पहुंच गए। इसके पहले सुंदरलाल लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं। 1999 में रीवा लोकसभा सीट से सांसद चुने गए और वर्ष 2013 में गुढ़ से विधायक चुने गए थे। अब पहला मौका होगा जब हार के बाद स्वयं को उबारने के लिए मेहनत करनी होगी। इसके पहले पिता ही सभी हालातों को संभालते रहे हैं।