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MP के इस जिले से मिटा कुपोषण का कलंक, 112 हाई बर्डन जिलों में अभी है ये 12 District

राहत: देश के 112 हाईबर्डन जिलों में प्रदेश के 12 जिले, सीधी-सिंगरौली भी शामिल

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Stigma of malnutrition in Erase from satna madhya pradesh

Stigma of malnutrition in Erase from satna madhya pradesh

रमाशंकर शर्मा @ सतना। कुपोषण को लेकर देशभर में बदनाम सतना जिले को आखिरकार एक दशक बाद कुपोषण के कलंक से मुक्ति मिल गई। भारत सरकार महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा देश के 112 हाईबर्डन जिलों की हाल ही में एक सूची तैयार की गई है, उसमें प्रदेश के 12 जिले शामिल हैं। सूची में सतना का नाम नहीं है। प्रदेश के जो 12 जिले अब हाईबर्डन श्रेणी में शामिल हैं उनमें सिंगरौली, सीधी, बड़वानी, दमोह, विदिशा, बुरहानपुर, टीकमगढ़, दतिया, अलीराजपुर, राजगढ़, श्योपुर और शिवपुरी शामिल है। अब इन्हें 'कुपोषणमुक्त भारत-मिशन 2022' के तहत वृहद कार्ययोजना बनाकर कुपोषण से मुक्ति दिलाई जाएगी।

ऐसे चर्चा में आया सतना
2007-08 में जिले के मझगवां ब्लाक में कई बच्चों की कुपोषण से मौत हुई थी। इसके बाद राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की टीम सतना पहुंची थी। बच्चों की मौत का मामला देश-विदेश में छाया रहा। इसे कवर करने के लिए विदेश की मीडिया भी मझगवां के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में पहुंची थी। तब से लगातार कुपोषण को लेकर जिले का नाम कालिख के रूप में सामने आता रहा है।

ऐसे हुई गणना
पूरे देश में कुपोषण की स्थिति का पता लगाने के लिए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 4 के परिणामों में बच्चों की स्टनिंग, अतिकम वजन तथा वेस्टिंग के आधार पर कुपोषितों की संख्या का आकलन किया गया। इससे मिले परिणामों के आधार पर हाईबर्डन जिले चिह्नित किए गए। इसमें देश के 112 जिले शामिल किए गए हैं।

यह होगा प्रयास
अब हाईबर्डन में शामिल प्रदेश के 12 जिलों को कुपोषण से मुक्ति के लिए शिशु एवं बाल आहार व्यवहार, टीकाकरण, संस्थागत प्रसव , बचपन का विकास, फूड फोर्टिफिकेशन, स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था, व्यक्तिगत स्वच्छता तथा खाद्य विविधता की दिशा में व्यापक पैमाने पर काम किया जाएगा। इन घटकों के आधार पर संबंधित जिलों में वृहद कार्ययोजना बनाई जाएगी। 2022 तक इन जिलों को कुपोषण मुक्त करना होगा। इसके लिए 10 जनवरी से अभियान की शुरुआत करनी होगी।

यह समन्वित प्रयास का नतीजा है। इधर चार माह में कुपोषण को लेकर और ज्यादा फोकस कर काम किया गया था। यह जिले के लिए हर्ष का विषय है।
मनीष सेठ, जिला कार्यक्रम अधिकारी

सतना का कुपोषित जिले की श्रेणी से बाहर आना काफी हर्ष का विषय है। इसके बाद भी अब जो भी कुपोषित बच्चे हैं उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिये वृहद प्लान तैयार किया जा रहा है। जल्द ही इन्हें भी कुपोषण से बाहर ले आएंगे। कुपोषण से पूर्ण मुक्ति हमारी प्राथमिकता में है।
मुकेश कुमार शुक्ला, कलेक्टर

यह हुए स्थानीय स्तर पर प्रयास
जिले में कुपोषण को लेकर प्रयास तत्कालीन कलेक्टर सुखबीर सिंह ने शुरू किए थे। उन्होंने एक कुपोषण फण्ड बनाया था। हर पंचायत को 10 हजार रुपए दिए थे। दस्तक कैम्पेन चलाया गया था। घर-घर जाकर कुपोषित बच्चों का चिह्नाकन करना और उन्हें थर्ड मील के रूप में अंडा और केला देने की शुरुआत की गई थी। इसके अलावा ग्रेन बैंक भी उन्होंने बनाया था। उसमें दान के रूप में हर पंचायत में खाद्यान्न इकट्ठा किया जाता था और कुपोषित बच्चों के परिवारों को दिया जाता था।

एनआरसी में भर्ती का प्रतिशत काफी बढ़ गया था

उन्होंने आंगनबाड़ी गोद लेने का अभियान चलाया। खुद भी एक आंगनबाड़ी गोद लिया और हर अधिकारी को आंगनबाड़ी गोद दिलाई थी। सतत मॉनीटरिंग वे खुद करते थे। इसके बाद दूसरा बड़ा प्रयास तत्कालीन कलेक्टर मोहनलाल मीना ने किए थे। उन्होंने एनआरसी में भर्ती बच्चों को छुट्टी के वक्त एक माह के राशन के रूप में गेहूं, चावल, दावल सीएसआर मद से दिलाने की व्यवस्था की थी। इसका नतीजा यह रहा कि एनआरसी में भर्ती का प्रतिशत काफी बढ़ गया था।

आंगनबाडी गोद लेने का अभियान

आंगनबाडी गोद लेने का अभियान जारी रहा। जिला कार्यक्रम अधिकारी के रूप में सौरभ सिंह ने कुपोषण से निजात का बड़ा प्रयोग अपने कार्यकाल में किया था। न्यूट्री कार्यक्रम नाम से किया गया उनका नवाचार बाद में प्रदेश भर में लागू हुआ था। इसमें हर आंगनबाड़ी में पारदर्शी जार में लाई, गुड़ और चना रखा जाता था। जिसे बच्चे जब भी मन हो निकाल कर खा सकते थे।

संयुक्त हेल्थ कैम्प शुरू

इसके लिए प्रतिदिन आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को जार भरने के लिए 100 रुपए दिए जाते थे। उन्होंने यूनीसेफ के सहयोग महिला बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य महकमे का संयुक्त हेल्थ कैम्प शुरू किया था। जिसमें कैंप के दिन संबंधित गांव में हर घर में टीम जाती थी और बच्चों को लाकर इलाज और काउसलिंग करती थी। इसमें मझगवां के 28 तथा परसमनिया के 16 गांवों को शामिल किया गया था।