10 फ़रवरी 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

1998 में सरहद पर लहू से शहादत लिखा था चूंद का कन्हैया, घर जाने से एक दिन पहले हुआ था ये

एक दिन बाद जाना था घर, पर ईश्वर को शायद ये नहीं था, इसलिए दूसरे दिन पहुंची अर्थी, वीरता की परंपरा को आगे बढ़ाने चूंद गांव का हर युवा बनना चाहता है सैन

3 min read
Google source verification

सतना

image

Suresh Mishra

Jan 26, 2018

story of choond village in satna Indian Army Soldiers news

story of choond village in satna Indian Army Soldiers news

सतना। सरहद पर लहू से शहादत पाकर चूंद का नाम इतिहास के पन्नों पर लिखने वाले कन्हैयालाल सिंह की बड़ी ही मार्मिक कहानी है। दो पुत्रियों और एक पुत्र के पिता कन्हैयालाल सिंह एक सिपाही के रूप में सेना में भर्ती हुए। इसके बाद अपनी काबीलियत के दम पर नायक के पद पर पहुंचे। 12 मई 1998 को उन्हें घर लौटना था। लेकिन ईश्वर को शायद ये मंजूर नहीं था।

11 मई को वह अपनी आखिरी डयूटी कर रहे। पुंछ सेक्टर के जलास नाम के सीमाई क्षेत्र में तैनात कन्हैया सिंह हर दिन की तरह अपने बंकर में बैठकर साथियों से साथ दौ सौ गज के फासले पर स्थित गतिविधियों पर पैनी नजर रखे हुए थे। अचानक अक्सर होने वाली दुश्मन की अकारण गोली बारी शुरू हो गई। भारतीय सैनिकों ने भी गोली का जवाब गोली से देना शुरू किया।

फायरिंग का सिलसिला देर तक चलता रहा। दोपहर को डेढ़ बज रहे थे कि अचानक कन्हैया सिंह के सीने में आग की सुलग उठी। कारण दुश्मन की हत्यारी गोली ने एक देश भक्त के गरम लहू से बंकर की धरती को लाल कर दिया। कन्हैया सिंह जो गिरे तो फिर उठ न सके। बंकर से उनकी मृत देह ही बाहर आई।

11 मई को शहीद 14 मई को मिली सूचना
गांव के महेश सिंह ने बताया कि कन्हैयालाल सिंह की मौत 11 मई 1998 को हो गई थी। लेकिन परिजनों को 14 मई को जानकारी मिली थी। कन्हैया सिंह के ही रेजीमेंट के एक वाहन ने दिल्ली से गांव आकर परिजनों को यह दुखद सूचना दी। दिल्ली से संदेश आने के बाद दोपहर तक राजपुताना राइफल्स के कुछ अधिकारी और जवान सेना के बैंड के साथ चूंद पहुंचे थे।

15 को हुआ था अंतिम संस्कार
पुंछ से विमान द्वारा दिल्ली लाए गए कन्हैया सिंह के मृत देह को लेकर सेना का ट्रक 14 मई की शाम 7 बजे चूंद पहुंचा था। धार्मिक-रीति के अनुसार रात को अंतिम संस्कार संभव न होने के कारण 15 मई को सुबह शहीद कन्हैया सिंह का पूरे सैनिक सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया था।

जिला प्रशासन के जिम्मेदार नहीं पहुंचे थे चूंद
शहीद की छोटी बेटी प्रियंका सिंह ने बताया कि उस समय मैं बहुत छोटी थी। हमे घटना ज्यादा याद नहीं है। हां गांव के लोग बतातें है कि पिता जी को पूरे सैनिक सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई थी। पर हैरानी की बात है कि देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले जवान के प्रति सम्मान करने के लिए जिला प्रशासन के किसी उच्च अधिकारी ने यहां आना गवारा नहीं समझा था। जबकि किसी घटना की जानकारी जिला कलेक्टर को सैन्य नियमों के तहत पूर्व में ही सूचित कर दिया जाता है।

कुछ दिन बाद आए थे तत्कालीन सांसद
हालांकि बाद में जिला सैनिक कल्याण बोर्ड के रिटायर्ड कर्नल गौतम सिंह, रिटायर्ड मेजर रामराज सिंह और तत्कालीन सांसद रामानंद सिंह ने बाद में चूंद पहुंचकर वीर कन्हैया सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की। शहीद की शहादत के दिन कोटर, बिरसिंहपुर, जैतवारा, सतना, कोठी, मझगवां से हजारों युवक शामिल हुए थे। पूरे गांव में मातम पसरा हुआ था।

क्यों जाते है इस गांव के सेना में
प्रदेश सहित जिलेभर के लोगों में यही सवाल रहता है कि आखिर ऐसी कौन सी बात है कि इसी गांव के लोग सेना में जाते है। तो इस सवाल का जबाव दिए चूंद गांव में ठाकुर बाबा के नाम से मसहूर वीरेन्द्र सिंह ने। जो कुछ वर्ष पहले सेना में सूबेदार के पद से रिटायर्ड होकर घर लौटे है। उन्होंने बताया कि चूंद गांव में बसे अधिकांश सोमवंशी ठाकुर जाति के युवाओं में अपने पूर्वजों द्वारा किए गए बहादुरी पूर्ण कारनामों को लेकर गौरव की भावना है। और उसी भावना के चलते वह सब वीरता की परंपरा को आगे बढ़ाने के उददेश्य से फौज में जाना पसंद करते है।