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गणेश बाग, कोटितीर्थ, देवांगना और बांके सिद्ध पहुंचा शोधार्थियों का दल, इस तरह क्रमश: मिल रहे प्रमाण

राम के वनवास काल और चित्रकूट के अगूढ़ तथ्यों की खोज के लिए निकली यात्रा दूसरे दिन कोटितीर्थ पंहुची।

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सतना

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Suresh Mishra

Sep 10, 2017

sweden scientist found lord rama footprint in satna madhya pradesh

sweden scientist found lord rama footprint in satna madhya pradesh

सतना/चित्रकूट। राम के वनवास काल और चित्रकूट के अगूढ़ तथ्यों की खोज के लिए निकली यात्रा दूसरे दिन कोटितीर्थ पंहुची। यह स्थान विंध्य पर्वतमाला में है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम के आने की सूचना पर *****ंख्य ऋषि आश्रम छोड़ दर्शन के लिए आकर यहां रुके थे। राम को अणिमा शक्ति का सहारा लेना पड़ा। अर्थात, जितने महात्मा उतने ही राम।

देव पत्नियों का विश्राम स्थल है देवांगना
कोटितीर्थ से एक किलोमीटर देवांगना है। माना जाता है, वनवास के समय राम से मिलने के लिए देवतागण आये तो इंद्र की पत्नी शची समेत अन्य देवताओं की पत्नियां यहीं रुकी थीं। इसीलिए इस स्थान का नाम देवांगना पड़ा। यह भी मान्यता है कि, मेनका नाम की अप्सरा ने यहीं तपस्या की थी।

शिलाखंडों से निर्मित गुफाएं

कोटितीर्थ से थोड़ा नीचे उतरने पर यात्रा का पड़ाव शिलाखंडों से निर्मित गुफाएं रहीं। पंपापुर गुफा में हनुमान विराजे हैं। दक्षिणमुखी हनुमान प्रतिमा पर लोगों की अटूट आस्था है। प्राकृतिक नजारों का अवलोकन करने के बाद यात्रा पेशवाओं द्वारा ग्रीष्म कालीन निवास के लिए बनवाये गए गणेश बाग़ पहुंची। 17वीं शताब्दी में विनायकराव पेशवा ने इस इमारत में आमोद-प्रमोद के सारे संसाधन और इंतजाम जुटाए थे। मनोरंजन के लिए एक बड़ी चौपड़ भी बनवाई। रानियों के के लिए बाथटब भी थे। इमारत में जल प्रबंधन की सुचारु व्यवस्था है।

प्राचीन शैली के षट्कोणीय मन्दिरों के पांच शिखर

पर्वतों से बहने वाले वर्षा जल को संरक्षित करने के इंतजाम थे। गणेशबाग की इमारतों का निर्माण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। प्राचीन शैली के षट्कोणीय मन्दिरों के पांच शिखर हैं। ख़ूबसूरत देव मूर्तियाँ हैं। कुछ रतिक्रीड़ा की है। प्रवेश द्वार के पास ही सात मंजिल की बावली भी निर्मित है। छह तल पानी में डूबे हुए हैं।

हजारों साल पुरानी रॉक पेंटिंग्स मिली
आदिमानवों द्वारा बनाई गयी रॉक पेंटिंग्स की कई कतारें मानव सभ्यता के विकास की कहानी बयां करती दिखाई देती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, शैल चित्रों के बनाने की अवधि के बीच हजारों साल का अंतर है। शैलचित्र वाली चट्टानों के नीचे चूल्हे जलाकर खाना पकाने से शैलचित्र अदृश्य हो रहे हैं। आश्रम में रहने वाले सन्यासियों ने भी चट्टानों में चूना पोतकर नष्ट कर दिया है। यहां तक जाने के लिए सुगम मार्ग का भी अभाव है।

प्राकृतिक गुफा है बांके सिद्ध
कर्वी से सिर्फ 3 किलोमीटर दूर बड़ी प्राकृतिक गुफा है। माना जाता है, इसमें वाणी की सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। वाक्सिद्ध नाम के स्थान का नाम अपभ्रंश होकर बांके सिद्ध पड़ गया है। महासती अनुसुइया के भाई कपिल मुनि ने यहां तपस्या की थी। वनवास काल में राम लक्ष्मण और सीता ने भी चतुर्मास यहां व्यतीत किया था।