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कब्जेदारों को जमीन दिलाने के हो रहे प्रयास

लिलजी जलाशय की जमीन वापसी के दो मापदण्ड सवालों में

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Suresh Kumar Mishra

Apr 30, 2016

satna news

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सतना।
सिंचाई विभाग के एक बड़े जलाशय को किस सुनियोजित तरीके से सिंचाई विभाग से राजस्व विभाग में बदलवा कर बाद में कब्जेदार किसानों को दिलाने का जो प्रयास किया जा रहा है, वह प्रदेश में अपने तरह का अकेला और अलग है। यहां एक जलाशय को अनुपयोगी बताते हुए किसानों को वापस करने की बात कही जा रही है, जो कि नियम-अधिनियम के विपरीत है। वहीं टोंस बाराज में मूल भू-स्वामियों को अनुपयोगी जमीन वापसी की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में एक ही जिले में जलाशयों की जमीन वापसी के दो मापदण्ड अब सवालों में खड़े हो गए हैं।


जानकारों का कहना है कि 70 के दशक में बस दुर्घटना के बाद से गेट खोल कर खाली कराए गए जलाशय के गेट फिर कभी नहीं भरे गए। दुर्घटना के बाद यहां के तत्कालीन मैदानी अधिकारियों ने जमीन को किसानों को बोनी के लिए देने के नाम पर बड़े खेल शुरू किए। मनमानी तरीके से किसानों को जमीनें दी जाने लगीं। जमीन पहले भी दी जाती थी लेकिन तब एक फसल के लिए बोली पर किसानों को देते थे।


लेकिन खाली हुए बांध पर अपनी कमाई के लिए मैदानी अमले ने फिर गेट बंद ही नहीं किया और बुवाई के लिए जमीन दी जाने लगी। बाद में यहां की जमीनों पर स्थानीय लोगों और दबंगों ने अपना कब्जा शुरू करना शुरू कर दिया। लेकिन मैदानी अमला आंख मूंदे खड़ा रहा। स्थिति यह हो गई कि यहां पांच सौ से ज्यादा लोगों ने अपना कब्जा कर लिया। हालांकि बीच बीच में अतिक्रमण हटाने की कागजी कार्रवाई भी की गई।


कहां गई सिवाय आय

शासन के नियमानुसार इस जमीन को जब खेती के लिए दिया जा रहा था तो उससे होने वाली आय का भी आज तक कोई अता-पता नहीं है। इस आय को सिवाय आय कहा जाता है लेकिन लिलजी से होने वाली सिवाय आय के संबंध में बड़ा खेल किया गया है। दस्तावेजों के अनुसार जितनी जमीन खेती के लिये दी गई है उसकी आधी भी सिवाय आय का हिसाब नहीं है।


अंतिम टीप महत्वपूर्ण

जानकारी के अनुसार लिलजी प्रकरण की फाइल में आखिरी टीप तत्कालीन कलेक्टर की ही है। जिसमें स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि यह जमीन मूल भू-स्वामियों को ही दी जा सकती है न कि कब्जेदारों को। यदि इसी टीप पर शासन गंभीरता से गौर कर ले तो स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी।


तो कलेक्टर को मिला था नोटिस

लिलजी की जमीन वापसी के संबंध में जब प्रक्रिया शुरू की गई थी उस वक्त से ही इसमें खेल शुरू हो गये थे। सीएम की घोषणा के बाद लगातार कलेक्टरों को दबाव देकर काबिज किसानों को जमीन वापसी के लिये दबाव आने शुरू हो गये थे। इसी दबाव में एक कलेक्टर ने तो अपनी रिपोर्ट में यह तक कह दिया था कि लिलजी के मूल भू-स्वामियों का कोई पता नहीं है, ऐसे में काबिज किसानों को ही जमीन दे दी जाए।


लेकिन जैसे ही यह रिपोर्ट शासन की नजर में आई तो पूरे महकमे में हंगामा खड़ा हो गया और काबिज किसानों को जमीन देने के मामले में भेजी रिपोर्ट पर शासन ने कलेक्टर से ही जवाब तलब कर लिया कि आखिर ऐसा कैसे लिख दिया? इस पर कलेक्टर ने आनन-फानन में संशोधन और सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ की। ऐसे ही एक खेल यह भी हुआ था जिसमें बिना तहसीलदार की अनुशंसा के नायब तहसीलदार के पत्र के आधार पर एक कंपनी को लिलजी की जमीन में खनन लीज की अनुमति दे दी थी। लेकिन मामला विधानसभा में पहुंचने के बाद एक बार फिर निरस्तगी का खेल खेला गया।


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