
Then wanted to watch movies on the VCR with friends
सतना. वीसीआर का नाम सुनते ही हमें अपने पुुरानेे दिन याद आ जाते हैंं। जब वीसीआर पर फिल्म देखने के लिए किसी खास दिन का इंतजार किया जाता था। उस खास दिन के आने से पहले दोस्त पैसे इकठ्ठे करते थे। क्योंकि वीसीआर उस समय में किराये पर भी इतना महंगा मिलता था कि एक व्यक्ति अकेले नहीं ला सकता था। इसलिए पैसे इकठ्ठेे कर वीसीआर को किराये पर लाया जाता था। दरअसल अस्सी और नब्बे के दशक में सिनेमा देखने के अंदाज में एक बड़ा बदलाव आया। पहली बार लोगों को मनचाही फि ल्म देखने के लिए सिनेमा हॉल जाने की जरूरत खत्म हो गई। लोग घर पर ही परिवार, दोस्तों के साथ वीसीआर के माध्यम से फिल्म देख सकते थे।
80 और 90 के दशक में जमकर मचाई धूम
वीसीआर ने ८० और ९० के दशक में जमकर धूम मचाई। हर कस्बे, शहर और चौराहों पर वीडियो कैसेट की दुकानें दिखने लगीं। कस्बाई शहरों और गांवों में वीसीआर को लेकर जमकर उत्साह रहता था। गांवों में भी शादी-समारोहों में नौटंकी सहित अन्य मनोरंजन के साधनों की बजाए वीसीआर मंगाए जाने लगे। लोगों को सस्ते, सुगम अंदाज में सिनेमाई मनोरंजन का लुत्फ मिलने लगा।
जो लाता उसकी पसंद से चलती थी फिल्म
तब वीसीआर मेे चलने वाली फि ल्में उसी व्यक्ति की पसंद की आती थी जो वीसीआर लाता था या जिसके घर प्रोग्राम होता था। उसी कहने पर वीसीआर चलाया और बंंद किया जाता था। रात को बच्चे घरों से छुुपकर वीसीआर देखने आते थे। कई बार बच्चों की इस हरकत के लिए उनकी पिटाई भी हो जाती थी। वीसीआर की कैसेट काफ ी बड़ी होती थी। फिल्म देखने के बाद लोग कई महीनों तक उनके बारे मेंं बातें करते रहते थे ।
अब वीसीआर की केवल यादें बाकी
वीसीआर कभी हमारे जीवन में मनोरंजन का महत्वपूर्ण साधान हुआ करता था, लेकिन अब वह केवल उसकी स्मृतियां बाकी रह गई हैं। एक समय था जब सिनेमा हॉल नहीं थे। वीडियो हॉल में वीसीआर से फिल्मे चलती थीं। जहां पर टिकटों की मारामारी रहती थी। लेकिन डीवीडी प्लेयर आने के बाद वीसीआर का महत्व घटता गया। अब वीसीआर लोगों की यादों में रह गया है।
शहर में नहीं थे सिनेमा घर
तब शहर में सिनेमा घर नहीं थे। वीडियो हॉल में वीसीआर के माध्यम से फिल्में चलती थीं। दोस्तों के समूह के साथ फिल्में देखने जाते थे। उसका अलग ही मजा था।
आरपी पटेल, निवासी उतैली
अधिक होता था किराया
वीसीआर का उस दौर में किराया अधिक होता था। एक व्यक्ति द्वारा किराये पर लाना संभव नहीं होता था। दोस्त मिलकर पैसा इकट्ठा करते थे। तब वीसीआर किराए पर ला पाते थे। रात में जागने के कारण घर पर डांट भी सुननी पड़ती थी।
जीपी मिश्रा, निवासी पौराणिक टोला
Published on:
08 Jun 2019 02:01 am
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