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Doctors Day: भगवान का रूप होता है डॉक्टर, इस कहावत को सच कर रहे ये लोग, आप भी करेंगे सलाम

भगवान का रूप होता है डॉक्टर, इस कहावत को सच कर रहे ये लोग, आप भी करेंगे सलाम

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disturbed patient in Katni district hospital

disturbed patient in Katni district hospital

सतना। ईश्वर के बाद अगर किसी व्यक्ति को जिंदगी देता है तो वह डॉक्टर ही है। इसीलिए उसे धरती का भगवान कहा जाता है। डॉक्टरी पेशे में कई बार ऐसे पल आते हैंं जब जीवन की उम्मीद लोग छोड़ देते हैं उस वक्त डॉक्टर मौत को मात देकर जिंदगी बचा लेता है। डॉक्टर के यही प्रयास लोगों की जिंदगी में नया सवेरा लाते हैं। ऐसे ही दो प्रकरण प्रस्तुत हैं।

1. बंद हार्ट बीट में डाल दी धड़कन
श्यामशाह मेडिकल कॉलेज में एक वाकया ऐसा भी हुआ जब डॉक्टर के लिए ही डॉक्टर भगवान बन गए। बात एनाटॉमी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. डीसी नाइक की कर रहे हैं। जिनकी हार्ट बीट बंद हो चुकी थी कई डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर लिए थे ऐसे वक्त में डॉ. केडी सिंह उनके लिए साक्षात भगवान का रूप बन गए थे। डॉ. डीसी नाइक बताते हैं कि 28 नवंबर 2011 की बात है। सुबह 8 बजा था। अचानक सीने में दर्द उठा। हिम्मत कर पड़ोस से डॉ. वीके पूरे को बुलाया। वह आए और नाड़ी देखते ही देखते बेहोश हो गया। उस वक्त हार्ट बीट थम सी गई थी। डॉ. वीके पूरे चिल्लाते हुए डॉक्टरों को आवाज देने लगे। डॉक्टर कॉलोनी के सभी डॉक्टर एकत्र हो गए। डीएम कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. केडी सिंह और मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. एमके जैन भी दौड़ते हुए आए। ज्यादातर डॉक्टर उम्मीद छोड़ चुके थे। शरीर में कोई हलचल नहीं थे। पूणे में पत्नी और बच्चों को फोन पर सूचना तक दे दी गई थी। ऐसे वक्त में डॉ. केडी सिंह ने उम्मीद नहीं छोड़ी। इसीजी मशीन और डीसी फिबिलेटर आता तब तक हाथ से ही सीपीआर देना शुरू कर दिया। करीब आधे घंटे की प्रोसेज में धड़कन शुरू हो गई। फौरन डॉ. एमके जैन ने डीसी फिबिलेटर से शरीर में करंट दिया। दो घंटे के उपचार के बाद ऐसा चमात्कार हुआ कि उसे कभी भूलाया नहीं जा सकता है। सांसे चलने लगी तो आइसीयू ले जाया गया। अगले दिन एयर एंबुलेंस से दिल्ली भेजा गया और आज सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। डॉ. नाइक बताते हैं कि दोबारा जीवन मिला तो सभी डॉक्टरों को पार्टी दी और उस दिन डॉक्टरी पेशे में आने और एक डॉक्टर की भूमिका सभी ने महसूस की थी।

2. 800 ग्राम की बच्ची में फूंक दी जान
पाण्डेन टोला की शिवांगी सेन कभी भी पहली डिलीवरी नहीं भूलेंगी। महज 800 ग्राम की बच्ची को जब जन्म दिया था तो परिजनों ने उसके जीने की उ?मीद छोड़ दी थी लेकिन डॉक्टर ने पच्चीस दिन के ट्रीटमेंट में बच्ची में जान फूंक दी। अब वह सामान्य जिंदगी जी रही है।बात नौ मई 2018 की है। प्रसूता शिवांगी सेन को छह महीने एक दिन के गर्भ पर जीएमएच के लेबर रूम में भर्ती किया गया था। पति मनीष सेन और उनके परिजन समय से पूर्व डिलीवरी को लेकर जच्चा-बच्चा के जीवन को लेकर भयभीत हो गए थे। स्त्री रोग विशेषज्ञ जैसे-तैसे नार्मल डिलेवरी कराने में सफल हो गए लेकिन जब नवजात बच्ची 8 00 ग्राम की जन्मी तो उन्होंने भी आखिरी उ?मीद पर एसएनसीयू में भर्ती करा दिया। परिजनों से कहा गया कि प्री-मेच्योर बच्ची को बचा पाना मुश्किल है। ऐसे में न्यूनेटोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ पटेल के मार्गदर्शन मे इलाज शुरू हुआ। बच्ची के आंखों की रोशनी धुंधली हो गई थी और भी कई प्रकार की शारीरिक समस्याएं थी। बच्ची को 25 दिन वेंटीलेटर पर रखा गया। इस दौरान उसकी आंखों का आपरेशन लेजर तकनीकी से किया गया। जिससे रोशनी की स्थिति ठीक हो गई। डॉक्टरों को उम्मीद जगी और उसकी देखरेख में जूनियर डॉक्टरों को भी लगा दिया गया। वजन के साथ-साथ शरीर की अन्य गतिविधियों को नार्मल करने की दवाएं शुरू हुई। नतीजा ये रहा कि अब वह बच्ची माता-पिता के गोद में खेल रही है।

3. कुष्ठ उन्मूलन को चैलेंज के रूप में लिया, बदल गई तस्वीर
नाम- डॉ. प्रवीण कुमार श्रीवास्तव
पद- जिला कुष्ठ उन्मूलन अधिकारी
उपलब्धि- सतना प्रदेश का पहला कुष्ठ उन्मूलन जिला बना, सर्वश्रेष्ठ कुष्ठ अधिकारी के तीन राज्य स्तरीय पुरस्कार
संदेश- सभी चिकित्सकों पर इल्जाम लगाना सही नहीं है। आज के व्यवसायिक माहौल में भी 90 फीसदी से ज्यादा चिकित्सक कठिन परिस्थितियों में पूरी मेहनत व ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं। यदि चिकित्सा संस्थानों का माहौल पूरी तरह सुरक्षित हो तो और बेहतर परिणाम दे सकते हैं।

कैसे मिली सफलता : 25साल पहले जिले में कुष्ठ रोगियों की बढ़ती तादात ने भारत सरकार को चिंता में डाल दिया था। देश में कुष्ठ उन्मूलन के लिए जिन 66 जिलों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ था उस सूची में सतना भी शामिल किया गया। साल 1998 में जब जिला अस्पताल के मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रवीण श्रीवास्तव को जिला कुष्ठ निवारण अधिकारी का दायित्व सौंपा गया उस दौरान यहां प्रति 10 हजार आबादी में 14 लोग कुष्ठ पीडि़त थे। चुनौती यह थी कि एक दशक के अंदर प्रति 10 हजार में 14 की बजाय एक व्यक्ति तक आंकड़ा लाना था। डॉ. श्रीवास्तव ने इसे चैलेंज के रूप ले लिया और आज प्रति 10 हजार में सिर्फ 0.15 नए मरीज सामने आ रहे हैं। लगातार जागरुकता के कार्यक्रम व मरीजों का फालोअप लेकर असल चुनौती को पार किया गया। इनकी मेहनत रंग लाई और भारत सरकार ने साल 2004 में सतना को प्रदेश का पहला कुष्ठ उन्मूलन जिला घोषित कर सम्मान से नवाजा। इसके अलावा डॉ. श्रीवास्तव को दो बार सर्वश्रेष्ठ कुष्ठ उन्मूलन अधिकारी का पुरस्कार मिल चुका है। डॉ. श्रीवास्तव ने बताया कि पिछले 25 सालों में जिले में रिकार्ड दो हजार से ज्यादा विकलांग सर्जरी हुई हैं। किसी एक साल में सबसे ज्यादा सर्जरी करने पर एमपी ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन द्वारा सम्मानित किया गया था।

4. कबड्डी को प्रोत्साहित करने खिलाडि़यों का मुफ्त में इलाज
नाम- डॉ. एसएन सिंह पाल
पद- बीएएमएस चिकित्सक
संदेश- डॉक्टरी सेवा भाव का पेशा है जिसमें मर्यादा बनाकर रखना बेहद जरूरी है। चिकित्सकों में मरीजों की सेवा प्रभु की सेवा वाला भाव होना चाहिए। समाजसेवा के कार्यों में भी योगदान देना चाहिए।
जिले के नागौद कस्बे में क्लीनिक चलाने वाले डॉ. एसएन सिंह पाल उस वक्त चर्चा में आए जब दो साल पहले घास की मशीन से एक बालिका की कटी उंगली को मामूली खर्च में जोड़ दिया था। बताया, रीवा से बीएएमएम करने के बाद नागौद में इसलिए क्लीनिक खोली ताकि अपने क्षेत्रवासियों की सेवा का अवसर मिले। एेसे कई मरीज होते हैं जो आर्थिक कारणों से बड़े शहरों में महंगे इलाज नहीं करा सकते। पूरी कोशिश रहती है कि कम पैसे में मरीज जल्द ठीक हो जाए। ये मरीजों का आयुर्वेदिक व एेलोपैथी दोनों पद्धतियों से इलाज करते हैं। यदि किसी के पास फीस के पैसे नहीं होते तब भी ये इलाज के लिए मना नहीं करते। उन्होंने बताया कि चिकित्सा पेशा के साथ ही वे कबड्डी जैसे पारम्परिक खेल व खिलाडि़यों के प्रोत्साहन के लिए भी प्रयास कर रहे हैं। अपनी क्लीनिक में उन्होंने क्षेत्र के दौ सौ कबड्डी खिलाडि़यों का इलाज मुफ्त कर रखा है।