10 फ़रवरी 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सवाई माधोपुर

सवाईमाधोपुर से गायब तो टोंक में भी काले हरिणों पर छा रहे संकट के बादल

साल दर साल घट रही संख्या वन विभाग की उदासीनता ना पड़ जाए भारी

Google source verification

सवाई मधोपुरपूर्व में रणथम्भौर की कुण्डेरा और फलौदी रेंज के कई क्षेत्रों में पर्यटकों को लुभाने वाले कृष्ण मृग यानि काले हरिण अब रणथम्भौर के जंगल से लुप्तप्राय हो गए है, पिछले सात सालो से अधिक समय से रणथम्भौर के जंगल में काले हरिण की मौजूदगी दर्ज़ नहीं की गई है
टोंक के जंगलो से रणथम्भौर आते थे काले हरिण
यूं तो रणथम्भौर में काले हरिण नहीं पाए जाते है, यहां सामान्य तौर पर साम्भर, चीतल, आदि सामन्य हरिण है पाए जाते है, लेकिन समीपवर्ती जिले टोंक के जंगलों में काले हरिण बहुतायत में पाए जाते थे, वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार टोंक के रानीपुरा, उनियारा, भोजपुरा आदि क्षेत्रों के वन क्षेत्र में आज भी काले हरिण पाए जाते है
टोंक में भी लगातार घट रही संख्या
रणथम्भौर में तो पिछले कई सालों से काले हरिण नजर है नहीं आए है पर अब तो पड़ोसी जिले के जंगल में भी इनकी संख्या में लगातार कमी आ रही है, इस बात की गवाही खुद वन विभाग के आंकड़े दे रहे है, वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार टोंक के जंगलो में कभी करीब 1500 काले हरिण थे, लेकिन फ़िर इनकी संख्या में लगातार कमी आ रही है, 2007 में 666, 2008 में 690, 2009 में 709, 2010 में 750, 2011 में 300 और 2012 में टोंक के जंगलो में 321 काले हरिण थे, 2016-17 में यह आंकड़ा गिरकर 65 तक पहुंच गया, वहीं 2018 में तो महज 31हरिण ही नजर आए, 2019 में टोंक के जंगलो में 57 हरिण पाए गए, ऐसे में काले हरिणो की संख्या लगातार घट रही है और वन्यजीव की इस प्रजाति पर संकट के काले बादल मंडरा रहे है पूर्व में काले हरिणो की संख्या में लगातार कमी होने का मुददा विधानसभा में भी उठ चूका है और टोंक के रानीपुरा वन क्षेत्र को लघु हरिण अभ्यारण्य का दर्जा देने की मांग भी की जा चुकी है, हालाँकि अब तक सरकार की ओर से इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है
इसलिए घट रही संख्यावन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार काले हरिणो के आस पास के जंगलो में जाने, जंगल से निकलकर जंगल से सटे आबादी क्षेत्रों में जाने के कारण काले हरिणो के शिकार की घटना पूर्व में काफी बढ़ गई थी हालांकि अब पिछले कुछ सालों में वन विभाग की सतर्कता के कारण इस पर अंकुश लगा है, वन्य जीव विशेषज्ञ की माने तो काले हरिणो में नर मादा का अनुपात बिगड़ने, यानि मादा की अपेक्षा नर हरिणों की संख्या अधिक होना भी इसका एक कारण माना जा रहा है
इनका कहना है…
पूर्व में रणथम्भौर में काले हरिण पाए जाते है साथ ही रणथम्भौर की सीमा पड़ोस के टोंक जिले से लगने के कारण पूर्व में रणथम्भौर के कुछ क्षेत्रों और सामाजिक वानिकी के अधीन आने वाले कुछ क्षेत्रों में काले हरिण नजर आ जाते थे लेकिन अब तो टोंक के जंगलो में भी काले हरिणों की संख्या में लगातार कमी आ रही है ऐसे में अब रणथम्भौर में सालों से काले हरिण नजर नहीं आ रहे है,आखरी बार रणथम्भौर में करीब पांच साल पहले काले हरिण नजर आए थे, खेतो में बाढ़ बंदी, आवारा श्वानो की संख्या बढ़ने और शिकार होने के कारण अब काले हरिण नजर नहीं आते है वन्यजीव की इस प्रजाति को संरक्षण की दरकार है
धर्मेंद्र खांडल, वन्य जीव विशेषज्ञ