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जन्माष्टमी विशेष…बांसुरी में कृष्ण के स्वरों का जादू

अनोखा वाद्ययंत्र, साज के जानकारों से बातचीत

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जन्माष्टमी विशेष...बांसुरी में कृष्ण के स्वरों का जादू

सवाईमाधोपुर. जिला मुख्यालय स्थित हाऊसिंग बोर्ड कॉलोनी में कान्हा की सजीव झांकी।

सवाईमाधोपुर. यूं तो बहुत से वाद्ययंत्र है, लेकिन बांसुरी का कृष्ण के जीवन में अलग महत्व है। भगवान कृष्ण ने ही बांसुरी को एक वाद्ययंत्र के रूप में पहचान दिलाई। बुधवार को कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। ऐसे में पत्रिका टीम ने भगवान कृष्ण की पहचान उनकी बांसुरी और उसकेे वादन को लेकर विशेषज्ञों से बात की और बारीकियों के बारे में जाना। पेश है एक रिपोट...र्।

छह स्वरों से पैदा होता है माधुर्य
यूं तो संगीत में सात स्वर होते हैं, लेकिन बांसुरी में छह ही स्वर होते हैं। बांसुरी में छह स्वरों से ही वादन करके धुन बजाई जाती है। संगीत विशेषज्ञों की माने तो बांसुरी बनाने व बजाने में मेजरमैंट का अहम रोल होता है। बांसुरी केे छिद्रों का आकार और बांस की मोटाई आदि का भी इसमें अहम किरदार होता है।

असम से आता है बांस
जिले में यूं तो स्थानीय स्तर पर ग्रामीण इलाकों में बांस से बांसुृरी का निर्माण किया जाता है, लेकिन गुणवत्ता पूर्ण बांसुरी बनाने के लिए निर्माता असम से बांस मंगाते हैं। असम का बांस हल्का होता है।

बांसुरी में होते है आठ छिद्र
बांसुरी में कुल आठ छिद्र होते हैं। इसमें पहला छिद्र मुंह के पास होता है। जिससे हवा फूंकी जाती है। बांसुरी में छह छिद्र सरगम के होते हैं, जिन पर उंगलियां फेरी जाती हैं। वहीं सबसे नीचे एक और छिद्र होता है जो आठवां छिद्र होता है जो ट्यूनिंग के लिए होता है। बजार में आम तौर पर 500 से 15 हजार तक की बांसुरी उपलब्ध है।

आधुनिक बांसुरी तीन प्रकार की, जो अलग-अलग गीत में आती है काम
बांसुरी वादक के पास यूं तो कई बांसुरी होती हैं, लेकिन इसमें मुख्य तीन प्रकार की होती हैं। सबसे छोटी बांसुरी चंचल प्रवृत्ति की होती है, जिसकी साइज 22 सेंटीमीटर होती है। इसका लोक संगीत और ऐसे अन्य सांग में इस्तेमाल होता है। वहीं मध्यम साइज की बांसुरी की लंबाई 42 सेंटीमीटर होती है।

इसकी प्रवृत्ति लाइट होती है, यानी बहुत सुरीली होती है। इसका इस्तेमाल रोमांटिक सांग वगैरह में होता है। वहीं सबसे बड़़ी बांसुरी, जिसकी साइज लगभग 90 सेंटीमीटर होती है, जिसकी आवाज बहुत ही भारी होती है यानी बेस आवाज के लिए इस्तेमाल की जाती है, जो शास्त्रीय संगीत वगैरह में बजाई जाती है।

कृष्ण के पास तीन तरह की बांसुरी
भगवान कृष्ण के पास 3 प्रकार की बाँसुरी होती हैं और सभी बाँस से बनी होती हैं। पहली मुरली यह 7 छेद की होती है। यह भौतिक संसार और गायों को आकर्षित करने के लिए होती है। दूसरी वेणु यह 9 छेद की होती है। यह गोपियों और राधारानी को आकर्षित करने के लिए होती है। इसको वह गोपियों को रास नृत्य के लिए बुलाने के लिए बजाते हैं। तीसरी बंशी यह 12 छेद की होती है। यह पेड़ों, नदियों, जंगलों आदि को आकर्षित करने के लिए होती है।

पन्नालाल घोष ने दी थी पहचान
महान भारतीय बांसुरी वादक पन्नालाल घोष ने सर्वप्रथम छोटे से लोक वाद्ययंत्र को बांस बांसुरी में परिवर्धित करके इसे परंपरागत भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए बजाने योग्य बनाया था। इसे अन्य शास्त्रीय संगीत वाद्ययंत्रों के कद का बनाया था।

एक्सपर्ट व्यू...बाँसुरी बजाते हुए कृष्ण
बाँसुरी की अभिव्यक्त शक्ति अत्यंत विविधतापूर्ण है, उससे लम्बे, ऊंचे, चंचल, तेज व भारी प्रकारों के सूक्ष्म भाविक मधुर संगीत बजाया जाता है, लेकिन इतना ही नहीं, वह विभिन्न प्राकृतिक आवाजों की नकल करने में निपुण है, उदाहरण के लिये उससे नाना प्रकार के पक्षियों की आवाज की हूबहू नक्ल की जा सकती है।
बाँसुरी की बजाने की तकनीक कलाएं समृद्ध ही नहीं, उस की किस्में भी विविधतापूर्ण हैं। जैसे मोटी लम्बी बांसुरी, पतली छोटी बांसुरी, सात छेदों वाली बांसुरी और ग्यारह छेदों वाली बांसुरी आदि देखने को मिलते हैं। उस की बजाने की शैली भी भिन्न रूपों में पायी जाती है। प्राचीनकाल में लोक संगीत का प्रमुख वाद्य था बाँसुरी।
-अभिशेखर शर्मा, बांसुरी वादक, सवाईमाधोपुर।