
Sawai Madhopur News : मछली, एरोहैड, शर्मिली, स्टार मेल, डॉलर मेल...। ये सब नाम सुनकर आप थोड़ा चौक रहे होंगे, कि आखिर ये किसके नाम हैं। लेकिन आज हम आपको बता दें कि इस तरह के यूनिक नाम रणथम्भौर ही नहीं देश के टाइगर रिजर्व के बाघ-बाघिनों के हैं। पर्यटकों व वन्यजीव प्रेमियों के बीच ये नाम एक खास पहचान रखते हैं। यहां तक कि वन विभाग के अधिकारियों के बीच भी ये अपने यूनीक नामों से ही जाने जाते हैं। लेकिन ये यूनीक नाम किस आधार पर रखे गए। इसी को लेकर पेश है पत्रिका की यह खास रिपोर्ट-
माथे पर बने निशानों से मिली पहचान
रणथम्भौर की बाघिन टी-16 को मछली नाम विरासत में मिला। वन अधिकारियों के मुताबिक मछली की मां जो मछली फर्स्ट के नाम से जानी जाती थी। उसके माथे पर मछली की आकृति का निशान था। बाद में बाघिन टी-16 के जन्म के बाद उसके माथे पर भी मछली जैसी आकृति रही। ऐसे में वन्यजीव प्रेमियों ने इसे भी मछली नाम दे दिया। रणथम्भौर में सबसे अधिक शावकों को जन्म देने के कारण इसे बाघों की अम्मा कहा जाता है। वहीं मछली की बेटी टी-84 के माथे पर जन्म से तीर के निशान जैसी आकृति थी। इस कारण वन्यजीव प्रेमियों ने बाघिन टी-84 को एरोहैड नाम दे दिया। आज भी रणथम्भौर में बाघिन टी-84 को एरोहैड के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यह बाघिन रणथम्भौर के जोन दो में विचरण करती है।
कम साइटिंग होने से शर्मिली नाम रखा
रणथम्भौर की बाघिन टी-26 को भी वन्यजीव प्रेमियों ने शर्मिली नाम दिया था। बाघिन को यह नाम उसके कम दिखाई देने और पर्यटकों को कम साइटिंग देने के कारण दिया गया था। वन विभाग से जुड़े लोगों ने बताया कि बाघिन टी-26 शर्मिले स्वभाव की थी। वह भ्रमण के दौरान पर्यटकों को कम ही नजर आती थी। यह बाघिन बाद में सुल्तानपुर इलाके में विचरण करती थी।
कॉरलवाली ने पेंच को दिलाई पहचान
मध्यप्रदेश के पेंंच टाइगर रिजर्व को पुनर्जीवित करने में बाघिन टी-15 यानि कॉलरवाली की बड़ी भूमिका रही थी। इसे सुपर मॉम के नाम से भी जाना जाता है। पेंच की बाघिन टी-15 के दोनों ही नामों के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। जानकारी के अनुसार बाघिन टी-15 की मॉनिटरिंग करने के लिए वन विभाग की ओर से बाघिन को रेडियो कॉलर लगाया गया था। बाद में रेडियोकाॅलर खराब हो गया लेकिन वन विभाग व वन्यजीव प्रेमियों में बाघिन का नाम कॉलरवाली ही रहा। बाघिन टी-15 अपने जीवन काल में आठ बार मां बनी और कुल 29 शावकों को जन्म दिया था। ऐसे में इसे पेंच की सुपर मॉम के नाम से भी जाना जाता है।
कान्हा का ओजी कैट
एमपी के कान्हा टाइगर रिजर्व के बाघ ओजी कैट की कहानी भी अनोखी है। वन्यजीव विशेषज्ञों ने बताया कि यूं तो कान्हा में इस बाघ को टी-17 के नाम से जाना जाता है, लेकिन कान्हा भ्रमण पर आने वाले पर्यटकों ने टी-17 को उसे माथे पर सीएटी (कैट) शब्द की आकृति होने के कारण उसे ओटी कैट नाम दिया। यह बाघ कान्हा में ओजी कैट के नाम से मशहूर हो गया। हालांकि 2019 में लकवा होने के कारण उसे वन विहार उद्यान में शिफ्ट किया गया, जहां एक साल बाद उसकी मौत हो गई।
ताड़ोबा की माया
महाराष्ट्र के ताडाेबा टाइगर रिजर्व की बाघिन टी-12 को पर्यटकों व वन्यजीव प्रेमियों के बीच में माया के नाम से जाना जाता है। टी-12 को यह नाम उसके कंधे पर एम अक्षर की आकृति होने के कारण दिया गया। वहीं वन्यजीव फिल्म निर्माता ऐश्वर्य श्रीधर ने ‘द टाइगर क्वीन ऑफ तरू’ नामक एक लघु फिल्म बनाई थी। इसमें बाघिन टी-12 की कहानी को फिल्माया गया था। ऐसे में इसे द टाइगर क्वीन ऑफ तरू के नाम से भी जाना जाने लगा।
एक्सपर्ट व्यू...
वन विभाग की ओर से हर बाघ बाघिन को एक स्पेसिफिक कोड नम्बर जारी किया जाता है। हर टाइगर रिजर्व में कुछ लोकप्रिय बाघ बाघिन होते है। पर्यटकों व वन्यजीव प्रेमियों की ओर से बाघ बाघिनों को अलग-अलग नाम दिए जाते है। कुछ बाघ बाघिन इन नामों से ही खासे प्रसिद्ध हो जाते हैं।
- संजीव शर्मा, उपवन संरक्षक, रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व, बूंदी।
Published on:
16 Feb 2024 08:46 am
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