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सवाई माधोपुर

चंबल में मगरमच्छ का शिकार की सूचना पर दिन भर चंबल की खाक छानती रही टीम

वन विभाग को नहीं मिला शव

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सवाईमाधोपुर. राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल अभयारण्य में शिकारियों द्वारा एक मगरमच्छ का शिकार करने की चर्चाएं जोरों पर है। मामला वन विभाग में भी आग की तरह फैल चुका है। चंबल में मगरमच्छ का शिकार होने की सूचना मिलने के बाद से ही वन विभाग की ओर से चंबल अभयारण्य क्षेत्र में लगातार गश्त कराई जा रही है। वन विभाग की ओर से शनिवार को सुबह से ही टीम से चंबल में गश्ती अभियान चलाया जा रहा है। इसमें विभाग की आठ सदस्सीय टीम को लगा रखा है लेकिन अब तक विभाग को मगरमच्छ का शव खोजने में सफलता नहीं मिली है। वन विभाग की टीम ने जिले के पूरे चंबल अभयारण्य की देर शाम तक खाक छानी और आसपास के किनारों पर जाकर भी शव को तलाश किया लेकिन वन विभाग को शव नहीं मिला। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि चंबल में भी अब शिकारी सक्रिय हो गए हैं और शिकारियों ने अवैध रूप से यूपी बिहार से बोट मंगाकर चंबल में शिकार व अवैध गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। वहीं वन विभाग के अधिकारी भी चंबल नदी में कुछ बोट के नजर आने की बात को स्वीकार कर रहे हैं। लेकिन अधिकारी अभी तक मगरमच्छ का शव मिलने और शिकार होने की पुष्टि नहीं कर रहे हैं।
मत्स्याखेट पर भी नहीं लग सकी लगाम
वन विभाग की ओर से भले ही चंबल में गश्त व मॉनिटरिंग के कितने ही दावे किए जाए लेकिन हकीकत में चंबल में आज भी धड़ल्ले से मत्स्याखेट हो रहा है। यहां परआज भी लोग अवैध तरीके से जाल फैंककर मछलीयों का शिकार कर रहे है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल अभयारण्य तीन राज्यों से होकर गुजरता है और कोटा आदि में भी इसका काफी बढ़ा क्षेत्र आता है। ऐसे में कोटा व मण्डावरा की ओर से भी मगरमच्छ के शरीर पर जाल लगने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।
पूर्व में भी मगरमच्छ के शरीर पर मिल चुका है जाल
राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल अभयारण्य में मगरमचछ के शिकार करने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी करीब आठ- नौ माह पूर्व पालीघाट पर नदी किनारे धूप सेंकते एक मगरमच्छ के शरीर पर टूटे हुए जाल के अंश मिल चुके हैं। लेकिन उस समय किसी भी मगरमच्छ के शिकार का मामला सामने नहीं आया था।
इनका कहना है…
धीरौली के आसपास चंबल नदी में मगरमच्छ के शिकार की सूचना मिली है। टीम से लगातार गश्त व टे्रकिंग कराई जा रही है। अब तक शव बरामद नहीं हुआ है।
– अनिल यादव, उपवन संरक्षक, राष्ट्रीय चंबल घडिय़ाल अभयारण्य।

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