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भगवतगढ़ में गुदरी मेले में सजी दुकान एवं मेले में उमड़ी भीड़।

भगवतगढ़ में गुदरी मेले में सजी दुकान एवं मेले में उमड़ी भीड़।

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मेले में उमड़ी भीड़।

मेले में उमड़ी भीड़।

भगवतगढ़ में गुदरी मेला चरम पर

भगवतगढ़. कस्बे में पीले तालाब के पास रविवार से शुरू हुए चार दिवसीय गुदरी मेले में सोमवार को मेले में पहुंचने वाले लोगों की भारी भीड़ रही। सुबह से ही शिवकुण्ड में स्नान एवं भोलेनाथ के दर्शन करने के बाद श्रद्धालु रंग बिरंगे वस्त्रों में सजकर मेला देखने पहुंचे। शिवकुण्ड से महिला एवं पुरुषों के अलग-अलग झुंड रसिया गाते हुए मेले में पहुंचे।

नाथ ? सम्प्रदाय ने स्थापित किया नया समाधि स्थल
मलारना डूंगर. कस्बे में वर्षों से घाटी पाड़ा स्थित नाथ सम्प्रदाय के सिद्ध पुरुष की समाधि को सोमवार को विधिवत पूजा अर्चना के साथ दूसरी जगह स्थापित किया गया। जानकारी के अनुसार संवत् 1291 में सिद्ध पुरुष मलिका नाथ महाराज ने कस्बे के घाटी पाड़ा में समाधि ली थी। अब नाथ समाज के लोग भूखा रोड स्थित कॉलोनी में आकर बस गए।

ऐसे में सम्प्रदाय के संतों से अनुमति लेकर सोमवार को समाधि स्थल से मिट्टी लेकर भूखा रोड स्थित गुर्जर मोग्या बस्ती के पास नया समाधि स्थल बनाया गया। यहां बालाजी हनुमानजी के स्थान से कलश यात्रा के साथ सिद्ध पुरुष की चरण पादुकाओं को सिर पर रख कर नए समाधि स्थल लाया गया। इससे पूर्व रविवार रात जागरण हुआ।

लोककथा : सौ में एक
एक बार की बात है। एक गुरु सौ वर्ष के हुए तो उन्होंने तय किया कि अब योग समाधि लगाकर देह त्यागना है। लेकिन इससे पहले आश्रम का उत्तराधिकारी घोषित करना बाकी था। गुरु की सेवा में बीस वर्षों से एक शिष्य पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ जुटा था। गुरु ने उसे आज्ञा दी कि वह पहाड़ स्थित आश्रम से नीचे तराई में जाए और अध्यात्म की राह पर चलने के इच्छुक और तत्पर सौ युवकों को लेकर आए। शिष्य गुरु को प्रणाम करके चला।

मार्ग में उसके मन में कई प्रश्न उठे। मन में आया कि गुरु मुझे ही उत्तराधिकार देंगे तो मेरे पीछे इतने शिष्य और सहयोगी छोड़कर क्यों जा रहे हैं? लेकिन गुरुजी ने कहा है तो गलत होने का प्रश्न ही नहीं उठता। आखिरकार शिष्य नीचे तराई में आकर सौ युवकों को एकत्र करके आश्रम के लिए रवाना हो गया। मार्ग में उसने देखा कि एक राज्य में मातम मचा था। पता चला कि राज्य की अस्सी कन्याओं की बारात को ले जा रहा एक जहाज समुद्र में डूब गया है।

राजा ने घोषणा कर दी कि जो उन कन्याओं से विवाह करेगा, उसे अपार संपत्ति मिलेगी। यह सुनते ही सौ में से अस्सी युवक शिष्य का साथ छोड़ विवाह करने चल पड़े। बचे हुए बीस युवकों में से उन्नीस युवक एक-एक कर रास्ते की कठिनाइयों से हार मानकर लौटते गए। जब शिष्य अपने गुरु के पास पंहुचा तो उसके साथ मात्र एक युवक था।

जाते ही उसने गुरु से कहा- 'गुरुवर, शुरू में मेरे मन में कई संदेह उठ रहे थे, पर अब मैं समझ गया आपने क्यों सौ लोगों को लाने के लिए कहा था। मैं यह जान गया हूं कि मंजिल की ओर निकलते सौ हैं, पर पहुंचता एक ही है।

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