
Happy Mahashivratri 2024 : देश में आज महाशिवरात्रि पर्व मनाया जा रहा है। श्रद्धालु इस अवसर पर महादेव मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करेंगे। इसी कड़ी में आज राजस्थान में भगवान शिव के बारहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध शिवाड़ के घूश्मेश्वर महादेव पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी। इस मंदिर को घुश्मा नामक एक ब्राह्मणी की शिवभक्ति की गाथाओं से जोड़कर देखा जाता है।
घुश्मेश्वर ट्रस्ट अध्यक्ष प्रेमप्रकाश शर्मा का कहना है कि महाशिवरात्रि महोत्सव शुक्रवार से सोमवार तक आयोजित होगा। महोत्सव के दौरान लाखों भक्त भगवान घुश्मेशवर महादेव के दर्शन व पूजा-अर्चना करने आते हैं। इस महोत्सव का शुभारंभ धर्म ध्वजारोहण के साथ होगा। इस दिन सुबह 11 बजे गौतम आश्रम से विशाल शोभायात्रा रवाना होकर कल्याणजी मन्दिर, मुख्य बाजार से होती हुई दोपहर 1 बजे घुश्मेश्वर मन्दिर पहुंचेगी।
घुश्मेश्वर ट्रस्ट की ओर से शोभायात्रा का स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसके बाद भगवान घुश्मेश्वर महादेव व धर्म ध्वजा का पूजन अर्चना करने के बाद दोपहर 1.30 बजे घुश्मेश्वर महादेव मंदिर के मुख्य शिखर पर धर्म ध्वजारोहण कार्यक्रम आयोजित होगा। इसके बाद दोपहर 3 बजे मेले का शुभारंभ कार्यक्रम किया जाएगा। इस दिन प्रदोष के अवसर पर भक्तों की ओर से चार प्रहर पूजन कार्यक्रम सम्पूर्ण रात्रि चलेगा।
रात्रि 9 बजे कालरा सत्संग भवन में महाशिवरात्रि जागरण व भजन संध्या कार्यक्रम होगा। अगले दिन महाशिवरात्रि के अवसर पर सम्पूर्ण दिन घुश्मेश्वर महाशिवरात्रि पूजा अर्चना कार्यक्रम रहेगा एवं शाम 6 से 7 बजे तक विशेष बैण्ड वादन कार्यक्रम होगा। रविवार 10 मार्च को भी विशेष बैण्ड वादन कार्यक्रम शाम 6 बजे से शुरू होगा।
इसके बाद सोमवार 11 मार्च को मन्दिर परिसर स्थित कालरा भवन में परम्परागत सोमवारीय जागरण कार्यक्रम आयोजित होगा। महाशिवरात्रि मेला स्थल पर चकरी, झूले सज कर तैयार हो गए हैं। इसके अलावा दुकानदार भी दुकाने सजाने में जुटे हैं।
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राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के घुश्मेश्वर महादेव मंदिर को भगवान शिव के बारहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में माना जाता है। माना जाता है कि घुश्मा नामक एक ब्राह्मणी की शिवभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसके नाम से ही यहां अवस्थित होने का वरदान दिया था। शिव मंदिर कितना पुराना है इसका ब्योरा यों तो उपलब्ध नहीं लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक यहां महमूद गजनवी ने भी आक्रमण किया था।
गजनवी से आक्रमण करते हुए युद्ध में मारे गए स्थानीय शासक चन्द्रसेन गौड व उसके पुत्र इन्द्रसेन गौड के यहां स्मारक मौजूद है। इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण का भी उल्लेख है।
वहीं अलाउद्दीन खिलजी द्वारा मंदिर के पास ही बनाई गई मस्जिद इस स्थान की प्राचीनता की पुष्टि करती है। मंदिर के ठीक सामने शिवालय सरोवर का भी अलग ही महत्व है। कहते हैं कि घुश्मा प्रतिदिन 108 पार्थिव शिवलिंगों का पूजन कर इस तालाब में विसर्जित करती थी। इसका प्रमाण सालों पहले इस तालाब की खुदाई के दौरान मिले हजारों शिवलिंगों से भी मिलता है।
मौजूदा मंदिर परिसर का भव्य रूप दानदाताओं की बदौलत ही है। मंदिर में पहली बार मार्च 1988 में ट्रस्ट का पंजीयन देवस्थान विभाग से कराया गया। इसके बाद से ही धीरे-धीरे यहां जनसहयोग मिलता गया और निर्माण कार्य होता रहा।
बड़े पैमाने पर निर्माण से कहीं-कहीं मंदिर का मूल स्वरूप भी बिगड़ा है लेकिन मंदिर का गर्भगृह जस का तस है। शिवाड़ के इस मंदिर को स्थानीयता की परिधि से बाहर कर देश भर में प्रचारित करने का सबसे पहले प्रयास शिवाड़ निवासी और सेवानिवृत्त तहसीलदार बजरंग सिंह राजावत ने किया।
उन्होंने तत्कालीन राजपरिवार के पोथीखाने से लेकर शिवाड़ के बुजुर्गों के पास उपलब्ध ताम्रपत्र व अन्य दस्तावेज जुटाए। विभिन्न स्तर पर पत्रव्यवहार कर यहां बारहवां ज्योतिर्लिंग होने के प्रमाणिक तथ्य हासिल किए। मंदिर से सटा हुआ भव्य गार्डन भी दर्शनार्थियों के आकर्षण का केन्द्र रहता है।
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Published on:
08 Mar 2024 11:58 am
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