
बाजार में सजी रंग और पिचकारी की दुकानें।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। समय के साथ सब बदल रहा है तो हमारे तीज-त्योहार पीछे कैसे रह सकते हैं। बदलाव की इस दौड़ में होली के रंग भी बदलते जा रहे हैं। एक समय वह भी था जब रंग, गुलाल नहीं होने पर लोग धूल, मिट्टी से ही होली खेल लेते थे और अब बिना अनुमति के होली में कोई पानी, रंग भी लगा देता है तो हम बुरा मान जाते हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि गांवों में गुलाल की जगह बच्चे धूल उड़ाते थे और होलिका दहन के दूसरे दिन धर्म, जाति और रंग भेद सब कुछ भूलकर हुलियारे घर-घर दस्तक देकर रंग लगाते और होली की शुभकामनाएं देते थे। समय के साथ बदलाव जरूरी है, लेकिन त्योहार की मस्ती में कोई कमी नहीं होनी चाहिए, सब मिलकर हस्ते हुए रंगोत्सव मनाए।
जिले में पांच दिवसीय रंगोत्सव की शुरुआत गुरुवार रात होलिका के साथ हो जाएगी। शुक्रवार को धुलेंडी होगी, इस दिन लोग गमी वाले परिवारों से मिलते हैं। 15 मार्च को शहर में महादेव की होली खेली जाएगी। कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा भगवान भोलेनाथ का अभिषेक कर होली के जुलूस की शुरुआत करेंगे। आष्टा, जावर और इछावर में 14 मार्च को होली खेली जाएगी। जिले में होलिका दहन की तैयारियां शुरु हो गई हैं, जगह-जगह होली बनाई जा रही हैं, करीब 2 हजार स्थान पर होलिका दहन होगा। सुरक्षा और हुलियारों का हुडदंग रोकने के लिए पुलिस ने भी सभी तैयारियां कर ली हैं। कलेक्टर बालागुरु के ने शराब की दुकान बंद रखने के आदेश दिए हैं। शुभ मुहूर्त्त में होलिका दहन के बाद शुरु होगा।
सीहोर के पंडित गणेश शर्मा ने बताया कि इस साल का पहला चंद्रग्रहण होली के दिन 14 मार्च को दिखेगा। यह सुबह 9.29 बजे से शुरू होगा और दोपहर 3.29 बजे खत्म होगा। ग्रहण से 9 घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाएगा। सूतक काल में कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता। हालांकि, इस ग्रहण का प्रभाव भारत में नहीं होने की वजह से यहां पर ग्रहण का सूतक काल मान्य नहीं होगा। यह ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा। इसलिए ग्रहण को लेकर नियम नहीं मान्य होगा। पंडित शर्मा ने बताया कि होलिका दहन 13 मार्च की रात को होगा और अगले दिन सुबह 14 मार्च को होली खेली जाएगी।
बरखेड़ी के 65 वर्षीय बनवारी लाल त्यागी बताया कि गांव में 50 साल पहले होली कुछ अलग ही तरीके से मनती थी। धुलेंडी के दिन रंग नहीं बल्कि धूल, गोबर को पानी में घोल बनाकर या फिर सूखा लगाकर एक दूसरे को रंगते थे। यही नहीं एकजुटता का परिचय देने के लिए ढोल बजाकर, फाग गाते हुए एक गांव से दूसरे जाकर लोगों को न सिर्फ बधाई देते थे।
भैया! अब क्या बताएं, पहले की होली की तो बात ही कुछ और थीं। अब तो दो-तीन दिन होती, लेकिन हम तो एक महीने पहले ही होली की शुरुआत हो जाती थी। बिजलौन के 62 वर्षीय बाबूलाल कुशवाह बताते हैं कि सप्ताह में एक दिन लगने वाले बाजार से थोड़ा-थोड़ा कर सामान खरीदकर लाते थे। जब यह सब होता तो होली के कुछ दिन पूर्व होलिका दहन करने कंडे एकत्रित करते थे।
13 मार्च पूजन समय शाम : 6.28 से 9.29, होलिका दहन समय रात : 11.26 के बाद लगातार
Published on:
13 Mar 2025 11:44 am
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