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मनुष्य जीवन में संस्कार अमूल्य निधि, धरोहर है- महाराज

जैन मंदिर में महाराज ने दिए आशीष वचन

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सीहोर

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Anil Kumar

Nov 08, 2019

 आशीष वचन

आशीष वचन

सीहोर.
आचार्य विद्या सागर महाराज के शिष्य मुनिश्री अजीत सागर महाराज का संसघ नगर में मंगल प्रवेश हुआ। इस दौरान जैन समाज ने उत्साह के साथ आगे आकर उनकी अगवानी की।

मुनिश्री ने पाŸवनाथ दिगंबर जैन मंदिर छावनी में अपने आशीष वचन में कहा कि संस्कार की निधि के द्वारा ही हम संस्कृ ति की निधि को प्राप्त कर सकते हैं। संस्कार ही एक ऐसी चीज है जो जन्म से लेकर मरण तक काम आती है। जन्म के समय संस्कार होते हैं तो मरण के समय भी होते हैं। यदि जन्म से हमारे संस्कार अच्छे हो तो हमारा मरण भी अच्छा होता है और मरण अच्छा श्रेष्ठ होने का अर्थ है कि अब हमारी यात्रा दैत्य कि नहीं देवत्व की होगी। पुण्यात्मा परमात्मा की यात्रा होगी।

संस्कार का अंत होता संस्कारों का नहीं
मुनिश्री ने कहा कि जैसे हमारे संस्कार होंगे वैसा ही हमारा संसार होगा। संस्कारों से ही संसार का अंत होता है तो संस्कारों से ही हमारा संसार अनंत होता है। कहने का तात्पर्य है कि संस्कार से हम संसार से तिर सकते हैं तो संस्कार से ही डूब सकते हैं। हमारे अच्छे संस्कार ही स्वर्ग और मोक्ष है तो हमारे बुरे संस्कार ही नर्क, निगोद है। यह संस्कार में कुछ तो मां के गर्भ से प्राप्त होते हैं, कुछ पूर्व जन्म के होते हैं और कुछ तो संगति के होते हैं। इन सब संस्कारों में मां के द्वारा प्रदत संस्कार ही श्रेष्ठ होते हैं जो गर्भ से लेकर आते हैं। जन्म के उपरांत बालक को धार्मिक व नैतिक संस्कारों से संस्कारित करें। मुनिश्री ने कहा कि जो संस्कार मां अपने बालक को दे सकती है वह ज्ञान, संस्कार पिता और न ही शिक्षक दे सकतें हैं। इसलिए मां को स्वयं संस्कारित होकर बच्चों को संस्कारित करना चाहिए। प्रवचन सुनने काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

व्यक्ति मोक्ष के द्वार खोल लेता है
आष्टा. दृढ़ इच्छाशक्ति व उच्च मनोबल वाला ही साधना के मार्ग पर चल सकता है। संसार में रहकर भी व्यक्ति मोक्ष के द्वार खोल लेता है। लिया हुआ संकल्प कभी नहीं तोडऩा चाहिए, कोई गलती हो जाए तो गुरु के समक्ष पहुंचकर उन्हें अवगत कराकर प्रायश्चित लेना चाहिए। संत के भेष में आचार्य विद्यासागर महाराज भगवान है। उनके गुणों एवं त्याग तपस्या का वर्णन करने के लिए शब्दकोश में शब्द कम पड़ जाएंगे। यह बात पाŸवनाथ दिगंबर जैन मंदिर में सिद्धचक्रमहामंडल विधान के चौथे दिन अपूर्वमति माता ने कहीं।