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सरपंच ने किया ऐसा काम की, दूसरों के लिए बन रहा नजीर

विधवा की कुटीर ढह गई तो अपने दम पर बनवाकर दे दिया नया आवास

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सीहोर

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Sunil Sharma

Oct 02, 2018

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सीहोर। सरपंच ने अपने प्रयासों से विधवा को अपने निजी रुपयों से बनवाकर दी कुटिया

सीहोर। आवास और कुटीर योजना के नाम पर सरपंचों द्वारा रुपए मांगने की बातें तो जब-तब सामने आ ही जाती हैं, लेकिन यह मामला गरीबों को सुविधा के दिलाने के नाम पर उनका हक मारने वालों के लिए किसी सबक सिखाने से कम नहीं है। दरअसल, कुलांशकलां पंचायत में निवास करने वाली एक दलित और विधवा महिला की कुटीर पिछले दिनों ढह गई।

शासन से भी तत्काल कुटीर मिलने आसार नजर नहीं आ रहे थे। परेशान विधवा और दलित महिला के दर्द को समझते हुए ग्राम पंचायत के सरपंच ने अपने दम पर विधवा के लिए पक्के मकान की सौगात दे दी। विधवा और उसकी बेटी की खुशियां देखते ही बनती है।

कुलांसकलां ग्राम पंचायत में निवास करने वाली ६० वर्षीय जमना बाई पत्नी रामवक्श अपने बेटी रेशम बाई और उसके छोटे तीन बच्चों के साथ निवास कर रही हैं। रेशम बाई के पति ने उसे छोड़ दिया है, इसके कारण वह अपनी मां के साथ ही रहती है।

बताया जाता है कि जमना बाई के पति की सात साल पहले मौत होने पर दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा था, लेकिन सीने पर पत्थर रख जमना बाई ने अपने बेटी व उसके बच्चों के सहारे जहर का घूंट पी लिया। इसके साथ ही एक बार फिर मेहनत मजदूरी कर अपनी जीवन की गाड़ी चलाने लगी।

जमना बाई ने बताया कि वह अपनी बेटी और उसके बच्चों के साथ जैसे-तैसे गुजर-बसर कर रही थी, लेकिन पिछले दिनों उसकी कच्ची कुटीर भी बारिश में ढह गई तो छत का सहारा भी छिन गया। वृद्धा ने बताया कि कुटीर योजना मेंं एक साल पहले आवेदन दिया था, लेकिन कुटीर के लिए उसका नाम नहीं आया।

रुधे गले से दलित ने कहा कि पास में कुटीर बनाने रुपए नहीं होने से आसमान की छत का ही आसरा नजर रहा था। उसने यह बात गांव के सरपंच गोपाल वर्मा को बताई था, जिसके बाद उन्होंने अपनी तरफ से पक्का आवास बनवाकर दिया। जिसमें उसका परिवार रहने भी लगा है।


अपने निजी रुपयों से बनवा दी विधवा का पक्का आवास
ग्राम पंचायत कुलांशकलां के सरपंच गोपाल वर्मा कहते हैं कि उनके पास दलित महिला ओर उसकी बेटी अपनी शिकायत लेकर पिछले दिनों आई थी कि उसकी कुटीर बारिश में ढह गई है। जानकारी पता करने पर विधवा महिला को आवास योजना का तत्काल लाभ मिलने की संभावना काफी कम नजर आ रही थी।

विधवा महिला और उसकी बेटी का दु:ख देखकर उन्होंने स्वयं ही अपने निजी रुपयों से छत वाला पक्का आवास बनवाकर देने का निर्णय लिया। इसके साथ ही विधवा को आश्वासन देते हुए उसका मकान का काम चालू करा दिया। मकान बनकर भी तैयार हो गया है और उसे विधवा का परिवार निवास भी करने लगा है।