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प्राचीन बावडिय़ां हो रही उपेक्षा का शिकार

प्रशासन नहीं दे रहा इस और ध्यान

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प्राचीन बावडिय़ां हो रही उपेक्षा का शिकार

प्राचीन बावडिय़ां हो रही उपेक्षा का शिकार

सिवनी. जिले में स्थित पुरानी बावडिय़ां उपेक्षा का शिकार हैं। जिसके कारण ये किसी भी दिन इतिहास का हिस्सा बन सकती हैं। किसी समय पूरे इलाके का गला तर करने वाली जिले की ये प्राचीन बावड़ी आज खुद प्यासी नजर आती हैं। दो तीन साल पहले तत्कालीन कलेक्टर धनराजू एस ने इन बावडिय़ों के सुधार की दिशा में कदम उठाया था। लेकिन उनके जाते ही यह पहल हवा हो गई। जिला मुख्यालय के अतिरिक्त लखनवाड़ा और लखनादौन के साथ घंसौर में भी इस तरह की जल सरंक्षण की संरचनाएं मिलती हैं। यदि निष्ठा से बावडिय़ों की सफाई कर दी जाए तो ये आज भी पूरे क्षेत्र की प्यास बुझा सकती हैं। इसके साथ ही भूजल स्तर बढ़ाने में भी इन बावडिय़ों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
जिला मुख्यालय में पुराने जमींदार दीवान का महल आज भी शुक्रवारी क्षेत्र में स्थित हैं। इस महल में एक प्राचीन बावड़ी है। जिसके बारे में शहर के अधिकांश लोगों को ही जानकारी नहीं है। इस बावड़ी के बारे में कई तरह की जनश्रुतियां कहीं जाती हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि दीवानखाने में पहले कचहरी भी लगा करती थी। इसके साथ ही बावड़ी से सुरंग निकली हुई थी जो लखनवाड़ा स्थित बावड़ी तक पहुंचती थी। बावड़ी के बारे में कहा जाता है कि यह कभी नहीं सूखती थी। लखनवाड़ा की बावड़ी आज भी काफी अच्छी स्थिति में है। इसमें लगे हुए पत्थर आदि आज भी सलामत हैं। लेकिन देखरेख न होने के कारण इसमें झांडिय़ां उग आईं हैं। लखनवाड़ा की बावड़ी के बारे में जनश्रुति है कि यहां की सुरंगे रामटेक तक भी जाती थीं जो सिवनी से एक सौ किलोमीटर दूर है। प्राचीन समय में सिवनी का इलाका विदर्भ राज के अंर्तगत आता था। इसके साथ ही सूरशाह सूरी के द्वारा बनाए गए। जीटी रोड के किनारे में ये बावडिय़ां स्थित हैं। पुरातत्व विभाग भी इन बावडिय़ों के अतीत को लेकर कुछ भी नहीं बता पाता है। ऐसे में निश्चय पूर्वक यह कहना मुश्किल है कि ये बावडिय़ां कितनी पुरानी हैं या किसके शासन काल के दौरान बनाई गई हैं।
लखनादौन की बावड़ी की बात करें तो यह भी फिलहाल अतिक्रमण और गंदगी की चपेट में है। लखनादौन पहले आदेगांव क्षेत्र के अंर्तगत आता था। जहां पर राजाओं के द्वारा निर्मित की गई एक गढ़ी है। माना जाता है कि लखनादौन की बावड़ी भी इसी गढ़ी का इलाका हो सकती है। नागपुर या तबके विदर्भ राज्य से आने वाली सेनाएं आदेगंाव की इसी गढ़ी में विश्राम किया करती थीं। इसके साथ ही शिकार के लिए राजा महराजा आया क रते थे। संभवत: उनके लिए इन बावडिय़ों का निर्माण किया गया। बाद में यह क्षेत्र गढ़ा मंडला के गौंड़ राजाओं के अधिपत्य में आ गया। मंडला जिले के रामनगर में भी एक बावड़ी मिलती है। जिसकी सरंचना इन बावडिय़ों की तरह है। ऐसे में गौंड़ राजाओं के द्वारा बनवाई गई जल संरचनाएं भी हो सकती हैं। लखनादौन की बावड़ी की सुरंग के बारे में कहते हैं कि कुछ दशक पहले एक भैंस यहां डूब गई थी जो बाद में यहां से 15 किलोमीटर दूर दर्शनीय स्थल मठघोघरा में मिली थी।
घंसौर के पास किंदरई के ग्राम बुढऩा में भी दो साल पहले एक किसान के खेत में बावड़ी निकल आई थी। किसान अपने खेत की मेढ़ बनाने के लिए पत्थर एकत्र कर रहा था। उसी समय बावड़ी निकल आई। माना जाता है कि यह इलाका राम वनपथ गमन का क्षेत्र है। हो सकता है कि इस बावड़ी का निर्माण उसी समय का हो।
जिले में स्थित प्राचीन बावडिय़ां उपेक्षा का शिकार हैं। लखनवाड़ा वैनगंगा नदी के तट पर बसा है लेकिन अक्सर यहां पानी की किल्लत रहती है। कुएं के पानी में फ्लोराइट की अधिक मात्रा रहने के कारण यह पानी पीने योग्य नहीं है। ऐसे में बावड़ी लोगों के लिए पेयजल का अच्छा साधन हो सकती है। लखनादौन की बावड़ी की बात करें तो यह फिलहाल अतिक्रमण की चपेट में है। देखरेख न होने के कारण यहां का पानी गंदगी और काई युक्त है। सिवनी की बावड़ी भी देखरेख न होने के कारण खत्म होने की कगार में पहुंच गई है। पुरातत्व विभाग ने इन बावडिय़ों के सरंक्षण के लिए कुछ खास कदम नहीं उठाए हैं। सिवनी के पुरातत्व कार्यालय में भी इस संबंध में किसी तरह की जानकारी नहीं मिलती है।