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महिलाओं ने की वटवृक्ष की पूजा

ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा में जगह-जगह हुई पूजा

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महिलाओं ने की वटवृक्ष की पूजा

सिवनी. ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के अवसर पर रविवार को महिलाओं ने वट सावित्री व्रत की पूजा की। रविवार को पूर्णिमा होने से ये योग और भी शुभ हो गया है।
पं. प्रभात तिवारी ने बताया कि वट सावित्री पूर्णिमा पर वट वृक्ष की पूजा की जाती है। महिलाएं इस वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और अपने पति के लिए सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। माना जाता है कि वट वृक्ष (बरगद का पेड) की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और पत्तियों में शिव का वास होता है। इसी वजह से वट सावित्री व्रत के दिन इस पेड़ की पूजा अर्चना की जाती है। महिलाओं ने पूजा करने के बाद सती सावित्री की कहानी सुनी और अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना की।
पं. प्रभात ने बताया कि सावित्री के पति सत्यवान अल्पायु थे। इसके बारे में उन्हें ऋषि नारद ने बताया था और उन्हें अपने लिए दूसरा पति मांग लेने को कहा था। लेकिन सावित्री ने कहा कि मैं हिंदू औरत हूं और एक बार ही अपना पति चुनती हूं। इसके कुछ समय बाद सत्यवाद को काफी दर्द हुए जिसके बाद सावित्री ने उन्हें वट वृक्ष के नीचे अपनी गोद में लिटा लिया। कुछ देर बाद वहां अपने यमदूतों के साथ मृत्यु के राजा यमराज पधारे। सत्यवान की आत्मा को यमराज के द्वारा ले जाते हुए देखकर उसके पीछे-पीछे सावित्री भी चलने लगी। उन्हें अपने पीछे आता देखकर यमराज ने लौट जाने के लिए कहा। लेकिन वो नहीं मानी और कहा कि जहां मेरे पति रहेंगे, मैं भी वहीं रहूंगी।
सावित्री के जवाब से खुश होकर यमराज ने उन्हें तीन वरदान मांगने को कहा। जिस पर उन्होंने सास-ससुर की आंखों की रोशनी, ससुर का खोया हुआ राज्य और सत्यवान के बच्चों की मां बनने का वर मांग लिया। इस पर यमराज ने तथास्तु कहा। जिसके बाद जब वो वापिस वटवृक्ष पर आईं तो देखा कि उनके पति के मरे हुए शरीर में प्राण वापिस आ गए हैं। इसी वजह से अमावस्या के दिन वटवृक्ष की पूजा करने से महिलाएं अपने पति के दीर्घायु होने की प्रार्थना करती हैं।