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28 माह: 2643 नवजात, 56 प्रसूताओं की अकाल मौत

लगातार जिले में प्रसूताओं और नवजात की मौत

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Shahdol Online

Sep 28, 2015

overdose injection

innocent death

शुभम सिंह बघेल.शहडोल। जिले का मॉडल अस्पताल भले ही प्रदेश की बेहतर अस्पतालों में शामिल हो गया हो, लेकिन यहां की बदहाली किसी से छिपी नहीं है। जिले में डॉक्टरों की भारी भरकम कमी से लगातार मरीज बेहतर इलाज के लिए दूसरे प्रदेशों का सहारा ले रहे हैं तो कहीं नवजात अकाल मौत की चपेट में आ रहे हैं। जिले के आदिवासी अंचलों में प्रसूताएं भी दम तोड़ रही हैं। जिससे दिल को दहला देने वाले कई सच सामने आए हैं। पिछले 28 माह के अंतराल में जिलेभर में ढाई हजार से अधिक नवजातों को विभाग मौत के मुहं से नहीं बचा पाया है। वहीं डॉक्टरों की लापरवाही और परिजनों की अनदेखी से आधा सैकड़ा से अधिक प्रसूताएं मौत के मुहं में समां गई हैं। जिले के इस आंकड़े ने सरकार द्वारा संचालित जननी शिशु सुरक्षा सहित विभिन्न स्वास्थ्य कार्यक्रमों की पोल खोल दी है।

2643 परिवारों का बुझा चिराग
जिले का स्वास्थ्य विभाग जन्म के बाद परिवार के चिराग को बचाने में नाकाम साबित हो रहा है। जिले के स्वास्थ्य विभाग का डरावना सच तो यह है कि 2013 से लेकर अब तक पिछले 28 माह के अंतराल में 2 हजार 6 सौ 43 बच्चों की अकाल मौत हुई है। इसमें अधिकांश नवजात ग्रामीण अंचलों के आदिवासी परिवार के हैं।

जिले में 56 प्रसूताओं की मौत
जिले की शासकीय अस्पतालों में अब तक 56 प्रसूताओं की मौत हुई है। यह आंकड़े अप्रैल 2013 से लेकर अगस्त 2015 तक के हैं। दम तोडऩे वाली अधिकांश महिलाएं आदिवासी परिवार की थी। अस्पतालों में हाई फीवर, एचवी की कमी, आयरन सुक्रोज का समय पर न लेना, सीवियर हापरटेंशन सहित अलग अलग संक्रमण प्रसूताओं की मौत का मुख्य कारण है।

मातृ- शिशु के मौत का मुख्य कारण
स्पेशलिस्ट डॉक्टर की कमी, समय पर महिलाओं को आयरन सुक्रोज न मिला, लगातार फॉलोअप न होना सहित देखरेख के अभाव में प्रसूताएं दम तोड़ रही हैं। वहीं सेप्सिस, निमोनिया, जन्मजात विकृति, जन्म के बाद फेफड़ों में पानी पहुंचना और देखभाल के अभाव में नवजातों की मौत का सिलसिला नहीं थम रहा है।

जन्म लेते ही सैकड़ों बच्चों की मौत
जिले में जन्म लेने के दौरान ही सैकड़ों बच्चों की मौत हो जाती है। इसके पीछे मुख्य कारण डॉक्टरों द्वारा फेफड़ों में पानी भर जाना बताया जाता है। आंकड़ों के अनुसार हर साल लगभग एक सैकड़ा से अधिक बच्चों की मौत उसी दिन हुई है, जिस दिन उनका जन्म हुआ है।

तो प्रसूताओं की बचा सकते हैं जान
- प्रसव काल में लगातार प्रसूताओं का फॉलोअप।
- प्रसव काल में आयरन सुक्रोज की दवाईयां देकर।
- महिला विशेषज्ञों द्वारा डिलेवरी की दौरान उपचार।
- ग्रामीण अंचलों में डॉक्टरों के माध्यम से प्रसव।
- आंगनबाड़ी केन्द्रों में प्रसव के दौरान विभिन्न जांच।

ऐसे बचाए जा सकते हैं नवजात
- बच्चे के जन्म के बाद कृत्रिम श्वास देने की सुविधा।
- जन्म के बाद तुरंत बेस्ट फीडिंग या मां का दूध देकर।
- एसएनसीयू में बेंटीलेटर की सुविधा।
- कमजोर बच्चों के लिए प्रशिक्षित स्टॉफ
- वजन के अनुरूप बच्चों का विशेष उपचार।

वर्ष नवजात की मौतप्रसूताओं की मौत
2013-14110226
2014-15131426
2015-1622704
(2015-16 में आंकड़े अगस्त 2015 तक के हैं।)

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