
Shubham Baghel
शहडोल- ये कहानी फिल्मी है लेकिन इसके सभी किरदार एकदम असली हैं। एक मजदूर की इस जीवन यात्रा में दुख, दर्द, मानवीयता, सस्पेंस और अंत में हिन्दी फिल्मों की तरह सुखद अंत भी है। इस कहानी को सुनते समय ऐसा प्रतीत होगा मानो पूरी फिल्म की स्क्रिप्ट है, अक्सर ऐसी कहानियां पुराने हिंदी फिल्मी में देखने को मिल ही जाती थीं, लेकिन शहडोल जिले के इस युवक के साथ पिछले कुछ महीनों में जो घटना घटी, वो लगती तो पूरी तरह से फिल्मी है लेकिन है असली।
ये है पूरी कहानी
वाकया कुछ यूं है कि एक 40 वर्षीय व्यक्ति मुफलिसी के चलते कुछ रुपए कमाने के लिए शहडोल जिले के बनचाचार गांव से माया नगरी मुंबई की तरफ कूच करता है और यहीं पर आता है उसकी जिंदगी में पेचीदा मोड़। सतना जिले के रामनगर निवासी राकेश सिंह की शहडोल जिले के जयसिंहनगर ब्लॉक के बनचाचर गांव में ससुराल है। उसके घर की माली हालत अच्छी न होने की वजह से वह नौकरी की तलाश में मुंबई गया था। राकेश मुंबई तो पहुंच गया लेकिन यहां पहुंचते ही उसका घर और ससुराल वालों से से संपर्क टूट गया।
फिर महीनों तक उसकी कोई खबर नहीं मिली। जब कोई संपर्क नहीं हुआ तो सभी लोगों ने उसके लौटने की उम्मीद भी छोड़ दी, लेकिन अचानक तीन महीने बाद राकेश फिर से ससुराल में दस्तक देता है।
वह वहां पहुंच तो जाता है लेकिन उसे ये पता नहीं रहता कि यह उसी का ससुराल है। उसे देखकर सभी लोग खुश हो जाते हैं, लेकिन वह भौचक्का है कि आखिर ये लोग इतने खुश क्यों हो रहे हैं? इसकी वजह क्या है ? ये लोग हैं कौन ? वह अपनी याददाश्त खो चुका था। सभी लोग उसे एक-एक करके रिश्तों की याद दिला रहे थे लेकिन उसे कुछ याद नहीं आ रहा था।
राकेश के परिजनों ने देखा कि उसके सिर में एक गड्ढा है। पेट में भी चीरा लगा हुआ है। सूजन भी है। परिजनों ने सोचा कि किसी गिरोह के चक्कर में ये फंस गया है, उसी गिरोह ने इसकी किडनी निकलवा ली है। वे उसको शहडोल में डॉक्टर के पास लेकर गए। डॉक्टर ने मरीज से पूछताछ की तो बताया कि वह मुंबई के एक अस्पताल में भर्ती था, वहां के डॉक्टर उसे अनाथालय में भर्ती कराने की बात कर रहे थे, तो वह वहां से भाग खड़ा हुआ। उसके जेब में आधार कार्ड था, स्टेशन से कुछ लोगों ने आधार पर पता देखकर उसे ट्रेन में बैठा दिया और वह लोगों से पूछ-पूछकर यहां पहुंच गया।
शहडोल जिला अस्पताल में पदस्थ डॉक्टर राजा शितलानी ने जब पूरे मामले की पड़ताल की तो पता चला कि मुंबई के डॉक्टरों ने भगवान बनकर उसकी मदद की है। जब डॉ. शितलानी ने संपर्क किया तो मुंबई के सायंस अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि राकेश स्टेशन पर घायल अवस्था में पड़ा था। कुछ लोगों ने उसे भर्ती कराया था। उसके सिर में गहरी चोट थी। ऑपरेशन किया गया। सिर की हड्डी को पेट में सुरक्षित रखा गया है। राकेश को अस्पताल में भर्ती होने से पहले का कुछ भी याद नहीं था। ऑपरेशन के बाद का उसे सबकुछ याद है, हालांकि अब धीरे-धीरे उसकी याददाश्त लौट रही है। मुंबई के डॉक्टर्स ने न केवल उसका इलाज किया, बल्कि तीमारदारी भी की और खाने-पीने का भी ख्याल रखा।
याददाश्त गई है, हड्डी पेट में रखी है
शहडोल जिला अस्पताल के डॉक्टर राजा शितलानी बताते हैं कि युवक की हादसे के बाद याददास्त चली गई थी। अभी धीरे- धीरे युवक को सबकुछ याद आ रहा है। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर्स ने मानवता की मिसाल पेश की है। डॉक्टर्स ने तीन माह तक युवक को पाला और ब्रेन का बड़ा ऑपरेशन किया। ब्रेन की हड्डी पेट में सुरक्षित रख दी थी। युवक के परिजन किडनी निकलने की आशंका जताते हुए मेरे पास इलाज के लिए पहुंचे थे, मैंने वस्तुस्थिति परिजनों को बताई है। बाद में युवक के ब्रेन की हड्डी को रिअटैच कर दिया जाएगा।
मजदूरी के लिए एक साल पहले मुंबई गए थे
युवक के जीजा तामेश्वर सिंह के मुताबिक मजदूरी के लिए एक साल पहले मुंबई गए थे। अचानक संपर्क टूट गया था। परिवार का हर कोई परेशान था। अचानक पांच माह बाद घर पहुंचे तो देखा कि सिर में गहरे घाव के निशान और पेट में सूजन है। डॉक्टर के यहां लेकर पहुंचे तो पता चला कि ब्रेन के ऑपरेशन के बाद हड्डी पेट में रखी गई है। हमें तो किडनी निकालने की आशंका थी। बाद में पता चला कि मुंबई सड़क हादसे में याददाश्त चली गई थी। जिसके बाद कार्ड में लिखे पते के आधार पर घर तक पहुंचे हैं।
Published on:
17 Apr 2018 02:59 pm
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