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फट्टी बाबा ने की थी कंकाली देवी की सेवा, जानिए कौन हैं फट्टी बाबा ?

श्रीफल से कैसे होती है फल की प्राप्ति?

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Baba had served Kankali Devi

Baba had served Kankali Devi

शहडोल - समीपी ग्राम अंतरा में विराजी माता कंकाली के बारे में कहा जाता है कि उन्होने एक आदिवासी की सेवा से खुश होकर ग्राम अंतरा में अपना धाम बनाया और भक्तों को अपने दरबार में बुलाकर उन्हे सुख समृद्धि का आशीर्वाद दिया। बताया गया है कि वर्षों पूर्व घनघोर जंगल के बीच एक आम पेड़ के नीचे माँ कंकाली की मूर्ति विराजमान थी। जिसकी सुरक्षा के लिए आसपास के ग्रामीणजन एकत्र हुए और मूर्ति को मंदिर के कक्ष में स्थापित करने के लिए काफी प्रयास किया, लेकिन माता की मूर्ति वहां से टस से मस नहीं हुई और ग्रामीणों के सारे प्रयास विफल रहे। इसी दौरान डोंगरगढ़ से गोंड आदिवासी काली चरण दास अंतरा आए और पूरी तन्मयता से माँ की सेवा में जुट गए। उनकी सेवा को देख आसपास के ग्रामीण उन्हे फट्टी बाबा कहकर पुकारने लगे। फट्टी बाबा ने एक बेटे की तरह माँ कंकाली की सेवा की। जिससे खुश होकर माता कंकाली ने फट्टी बाबा को अपनी सेवा करने का आशिर्वाद दिया और बाबा के दिशा-निर्देश पर माँ कंकाली की मूर्ति को मंदिर के कक्ष में स्थापित कर दिया गया। तब से लेकर अब मां कंकाली मंदिर के उसी स्थान पर विराजी हैं और हर भक्त पर उनकी कृपा बरस रही है। बताया गया है कि फट्टी बाबा गत सन् 1958 में अंतरा आए और सन् 1992 में मौनी अमावस्या के दिन मंदिर के समीप समाधि ले ली। उक्त स्थल पर वर्तमान में फट्टी बाबा का एक मंदिर भी बनवा दिया गया है। फट्टी बाबा ने देवी कंकाली की बेटे की तरह सेवा की और उनकी सेवा शीतला बाबा ने की। समाधि लेने के पूर्व फट्टी बाबा ने माता कंकाली की सेवा करने का जिम्मा शीतला बाबा को सौंपा था। जो आज भी माता की सेवा में दिन-रात जुटे रहते हैं।

IMAGE CREDIT: patrika

श्रीफल से होती है फल की प्राप्ति
मंदिर के पंडा और ग्रामीणों ने बताया की माता रानी की अपार कृपा क्षेत्र में बरस रही है। मां कंकाली के दरबार में कोई भी भक्त अगर सच्ची आस्था लेकर पहुंचा है। तो मां उसकी झोली को सदा-सदा के लिए भर देती हैं। आस्था के इस केंन्द्र की प्रमुख बात ये है की नारियल को लाल कपड़े में बांधकर मन्नत कर उसे मंदिर में बांध देते हैं। तो उनकी हर मनोकामना मां कंकाली पूरी करती हैं। सच्ची आस्था और एक श्रीफल मनुष्य के जीवन से पूरे कष्ट को दूर कर देता है।

मंदिर का इतिहास
मां कंकाली के इस भव्य मंदिर और दिव्य प्रतिमा का इतिहास सालों पुराना है। यहां पर एक एक लेख के अनुसार 10वीं 11वीं सदी के कल्चुरी काल का बताया जा रहा है। यहां पर मां चामुंडा, शारदा, अष्टभुजी सिंहवाहिनी प्रतिमाएं भी गर्भगृह में स्थापित हैं। 18 भुजी मां चामुंडा , आंखें फटी हुई। भयोत्पादक खुला मुंह, नसयुक्त लगी हुई ग्रीवा, गले में मुंडमाला, शरीर अस्थियों का होने से इनका नाम कंकाली पड़ा। हाथों में चंड-मुंड नामक दैत्य, अलंकृत प्रभामंडल, पैरों के पास योगनियां अलंकृत हैं। सभी भुजाओं में परंपरागत आयुध धारण किए हुए हैं। एक हाथ वरद मुद्रा और दूसरे हाथ में कमाल पुष्प धारण किए हुए हैं।