
Narmada river is polluted
शहडोल। कई प्रदेशों के लिए लाइफलाइन मानी जाने वाली नर्मदा उद्गम से कुछ दूरी पर ही प्रदूषित होना शुरू हो जाती है। शहर से निकलने वाला गंदा पानी मंदिर के ठीक पीछे, नर्मदा के पानी में मिला दिया जाता है। ये सिलसिला पिछले कई दशकों से चला रहा है। नर्मदा के उद्गम से पानी निकासी के लिए तैयार किए गए नाला के ठीक तीन गुने आकार के नाले से शहर का गंदा पानी सीधे यहां छोड़ा जाता है। ऐसा भी नहीं है कि अमरकंटक में ही नर्मदा को ्रप्रदूषित करने की जानकारी जनप्रतिनिधियों के साथ बड़े अधिकारियों को न हो। कई बार स्थानीय लोगों ने इस मुद्दे को भी उठाया। ज्ञापन भी दिया और हाइकमान तक पहुंचाया लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। हर दिन बड़े पैमाने में नाले का गंदा पानी नर्मदा में छोड़ते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो गंदा पानी नर्मदा में मिलने की वजह से पीने के उपयोग लायक नहीं रहता है। नालियों का गंदा पानी छोडऩे की वजह से स्थिति यह है कि पानी कुछ दूरी तक काला नजर आता है। बिना ट्रीटमेंट के ही इस पानी को नर्मदा में छोड़ दिया जाता है।
धीमी गति से चल रहा काम
डिंडोरी में एक तरफ नर्मदा का जलस्तर लगातार घट रहा है, दूसरी तरफ प्रदूषण व्यापक स्तर पर किया जा रहा है। शहर डिंडौरी में ही नर्मदा की हालत काफी खराब है। यहां पर नगर के सभी नाले सीधे तौर पर मां नर्मदा को प्रदूषित कर रहे हैं। प्रदूषण रोकने कार्ययोजना पहले से बनाई नहीं गई। शहर के विस्तार के साथ ही पूरा दबाव नर्मदा पर है। पिछली सरकार ने यहां पर सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाने की घोषणा भी की थी जिस पर काफी धीमी गति से काम चल रहा है।सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनकर तैयार भी हो जाता है तो भी गंदगी दूसरे तट से आएगी।
मंडला में 24 वार्डों के रिहायशी क्षेत्र की सभी नालियां 16 नालों के जरिए नर्मदा नदी में मिलती हैं। नर्मदा के वे सभी 16 घाट जहां आकर नाले मिलते हैं, उनमें दिन भर बदबू और सड़ांध छाई रहती। नर्मदा को स्वच्छ करने के लिए सभी 16 नालों को बंद करने के लिए वृहद सीवर लाइन के निर्माण को नपा ने वर्ष 2013-14 में स्वीकृति दी थी। इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए 33 करोड़ रुपए की राशि खर्च होनी थी। जिसमें 70 प्रतिशत वित्तीय सहायता जर्मनी देश का केएफडब्ल्यू बैंक द्वारा दिया जा रहा था। आधे-अधूरे निर्माण के बाद 33 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट को रोक दिया गया। निर्धारित मापदंडों के अनुसार निर्माण न होने से जर्मनी ने निवेश रोक दिया था। एग्रीमेंट के अनुसार, जर्मनी का केएफडब्ल्यू बैंक योजना में व्यय होने वाली राशि का 70 प्रतिशत निवेश करता।
एक्सपर्ट व्यू: जलीय जीवों का संरक्षण जरूरी
शहरी क्षेत्र में नर्मदा तट पर मछलियों का शिकार, कछारों में कीटनाशक, घाटों में साबुन सोडा के उपयोग ने मां नर्मदा के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। ईको क्लब प्रभारी राजेश क्षत्री के अनुसार, जल को प्राकृतिक रूप से नदी को शुद्ध करने के लिए जलीव जीवों का संरक्षण करना आवशयक है। जैविक संरक्षण जोन मेंं नदी के किनारे पॉलिथिन, कछारो में कीटनाशक दवा, उर्वरक, रसायनिक खाद के बदले जैविक खाद का उपयोग किया जाए। इसके साथ ही निर्धारित क्षेत्रों में मछली, केकड़े व अन्य जलीय जीवों के मारने पर प्रतिबंध लगाया जाए। नर्मदा तट में सघन रूप से औषधीय पौधों को रोपित किया जाए।
गंदे पानी का नहीं हो पा रहा ट्रीटमेंट
सभी गंदे नालों को एक सीवर लाइन से जोडऩा था। यह सीवर लाइन इंटेक वेल के पास बन रहे विशाल सोकपिट में आकर खुलती। इस सोकपिट में पानी का शुद्धिकरण होता। स्वामी सीताराम वार्ड स्थित इंटेक वेल के पास सोक पिट एवं शुद्धिकरण संयंत्र आधा-अधूरा है। इसके लिए नर्मदा के घाट पर विशाल टंकी और क्रांकीट दीवार बनाई गई है। उच्च तकनीक से बन रहे इस पिट में काम होना बाकी है। नगर का सबसे बड़ा नाला, नकटा नाला आजाद वार्ड स्थित घाट में आकर मिलता था। 20 फिट गहरे और 50 फिट से अधिक चौड़े नाले में शहर की सैकड़ों नालियां आकर मिलती थीं। इसको बंद कर दिया गया है। इसके लिए कई टन मिट्टी, कई ट्रक मुरम, मलबा से भराव किया गया है। नपाके अनुसार लगभग 2.50-3.00 लाख रुपए सिर्फ इस नाले के भराव में खर्च किए गए।
Published on:
12 Feb 2019 02:43 pm
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