
पोते-पोतियों को किस्से सुनाने की उम्र हुई तो कर दिया घर से बाहर
शहडोल. जैसे ही माता-पिता होने की जिम्मेदारी पूरी हो गई, वे अपनी संतानों के लिए बोझ बन गए। जब पोते-पोतियों को जीवन के अनुभव और किस्से सुनाने के दिन आए तो उस घर के कोने में उनके लिए कोई जगह ही नहीं थी। जिस घर को जीवनभर की तपस्या के साथ सजाया, उन्हें वहीं से बेगाना कर दिया गया। उम्र के आखिरी पड़ाव में सब सबसे अधिक सहारे की जरूरत थी, उसी समय उन्हें वहां से कूच करके वृद्धाश्रम को अपना ठिकाना बनाना पड़ा। वृद्धाश्रम में रहकर जीवन गुजर बसर करने वाले वृद्धों में से कुछ ऐसे है जिन्होंने माता-पिता का सिर से साया उठते ही सब कुछ छोड़ दिया। अब इनकी पूरी दुनियां वृद्धाश्रम में ही है। हालांकि मन में एक कसक भी है। इन सभी को अपनों से तो शिकवा नहीं लेकिन सरकार से जरूर शिकायत है। आज के दौर में भी इन्हें महज 300 रुपए ही वृद्धा पेंशन मिल रही है। इनका कहना है कि राशि बढ़ाने पर सरकार को विचार करना चाहिए।
फिर लौटकर नहीं गया
कल्याणपुर स्थित वृद्धाश्रम में लगभग 4 वर्ष से रहे रहे आंध्र प्रदेश के मदन पल्ली गांव के निवासी व्यंकटा चलापति 61 वर्ष पिता की मृत्यु के बाद कुछ ऐसी स्थिति निर्मित हुई कि घर परिवार से 30 वर्ष पूर्व विरक्त होकर चले आए। जिसके बाद वह दोबारा लौटकर नहीं गए। लगभग 12 वर्ष का समय शिरडी में, 12 वर्ष अमरकंटक में गुजारने के बाद अब ४ वर्ष से ज्यादा समय से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। व्यंकटा चलापति का कहना है कि अब उनके लिए वृद्धाश्रम ही सबकुछ है।
स्कूलों में जाकर पढ़ाता हूं
उमरिया निवासी शैलेन्द्र शर्मा जीवन के 73 बसंत पार करने के बाद भी अपने आप को पूरी तरह से फिट व खुशहाल रखने का प्रयास करते हैं। वर्ष 1965 में हायर सेकेण्ड्री पास करने वाले श्री शर्मा के अंदर पढ़ाई को लेकर विशेष लगाव है। उनका कहना है कि जब भी उनकी इच्छा होती है तो वह आस-पास के विद्यालय पहुंच जाते हैं और वहां छात्रों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं। इससे उन्हे एक अलग ही आनंद की अनुभूति होती है। कुछ काम करने में भी सक्षम नहीं है। जिसके चलते वह लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व यहां आ गए थे।
जीवन के 10 वर्ष गुजार दिए
पत्नी की मौत के बाद शहडोल निवासी हरीराम खयाने ने अपनी जिंदगी के 10 वर्ष वृद्धाश्रम में ही गुजार दिए। शेष जीवन भी वह यहीं गुजारना चाहते हैं। हरीराम का कहना है कि उन्हें यहां अच्छे मित्र मिल गए हैं। सबसे बुजुर्ग वही हैं इसका सभी ख्याल रखते हैं। इन्ही सबके सहारे उनका जीवन खुशी-खुशी बीत रहा है।
बेटी के जाते ही हो गए अकेले
नगर के वार्ड क्र.21 निवासी राम भवन यादव 72 वर्ष की पत्नी के मौत के बाद बेटी सहारा थी। जिसके साथ वह खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे। बेटी के शादी के बाद अकेले पड़ गए और उम्र के साथ बीमारियों ने भी उन्हे जकडऩा शुरू कर दिया। ऐसे में अब उनका कोई ख्याल रखने वाला नहीं था। अब वृद्धाश्रम को ही अपना घर परिवार मानकर यहीं जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
अब तो मुन्ना ही सब-कुछ है मेरा
निजी विद्यालय में अध्यापन कार्य करने वाले सतना के कामता टोला निवासी वंशगोपाल सोनी का जीवन भी वृद्धाश्रम में ही गुजर रहा है। अंग्रेजी से विशेष लगाव रखने वाले वंश गोपाल सोनी का कहना है कि अब उनके लिए सबकुछ वद्धाश्रम का केयर टेकर मुन्ना ही है। घर परिवार कोई मायने नहीं रखता है। वृद्धाश्रम के बुजुर्ग हरीराम उनके चाचा है। उन्हीं के साथ खुशहाल हैं।
Published on:
23 Jul 2018 07:50 pm
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