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अद्भुत है ये मंदिर, कल्चुरीकालीन, उच्च शिल्पकला, दिलाता है खजुराहो की याद

जानिए इस मंदिर में क्या-क्या है खास ?
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शहडोल

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Akhilesh Shukla

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Updated: 5 Apr 2018, 3:24 PM IST

This temple is wonderful, Recall remembers Khajuraho

शहडोल- संभागीय मुख्यालय में स्थित विराट मंदिर की अपनी एक अलग ही पहचान है। अद्भुत है ये मंदिर, कल्चुरीकालीन है ये मंदिर, उच्च शिल्पकला, एक बार देखने के बाद कुछ-कुछ खजुराहो की याद जरूर जेहन में आती है। एक तरह से देखा जाए तो इस मंदिर को देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी रहती है। अगर कोई बाहर से भी शहडोल आता है तो वो इस मंदिर में घूमने जरूर जाता है। क्योंकि इस कल्चुरीकालीन मंदिर में उच्च शिल्पकला के साथ-साथ भगवान शिव की शिवलिंग भी स्थापित है, जहां बोलेबाबा के भी दर्शन किए जा सकते हैं।

पौैराणिक कल्चुरीकालीन विराट मंदिर में मानव के बेहतर जीवन का सार छिपा हुआ है जहां स्थापित शिवङ्क्षलग के दर्शन मात्र से मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं। जीवन में ब्रम्हचर्य से संन्यास तक का सफर, धर्म, अर्थ और काम के बाद मोक्ष प्राप्ति के लिए आत्मा का परमात्मा में मिलन के संपूर्ण दर्शन इस मंदिर में प्राप्त होते हैं। बेहतर जीवन के लिए अगर हम विराट मंदिर और वहां की कलाकृतियों को देखें और समझें तो हमारा सामाजिक और आध्यात्मिक विकास आज भी संभव है। भारतीय संस्कृति के अनुसार सामाजिकता और आध्यात्मिकता के साथ जीवन में जीने की कला इस मंदिर की दीवारों में उकेरी गईं हैं, जो कलाकृतियों में स्पष्ट दिखाई देती है।

परमात्मा के स्वरुप में हैं छोटे शिवलिंग
मंदिर में शिवलिंग के दर्शन करने पर अक्सर ये सवाल उठता है कि विराट मंदिर के अंदर स्थापित शिवलिंग छोटे क्यों हैं इसके जवाब में परातत्व विभाग का मानना है कि जिस प्रकार शरीर में आत्मा का स्वरूप सूक्ष्म होता है। उसी प्रकार विराट मंदिर में परमात्मा के स्वरूप में शिवङ्क्षलग विराजमान है। कल्चुरी कालीन राजा युवराजदेव प्रथम भगवान शिव के उपासक थे। और उन्होंने ही सामाजिक और आध्यात्मिक विकास के दृष्टिकोण से विराट मंदिर का निर्माण कराया था। दसवीं शताब्दी उत्तरार्ध में निर्मित इस मंदिर में पूर्व की ओर मुख्य द्वार है। ये मंदिर वेसर शैली में बनी है जिसमें मंडप, अंतराल और गर्भ गृह है।

उच्च शिल्पकला का अद्भुत प्रदर्शन
भगवान शिव का प्रसिद्ध विराट मंदिर और उसकी उच्च शिल्प कला को देखकर हमें चंदेलकालीन खजुराहो मंदिरों की याद आती है। मंदिर के गर्भ के प्रवेश द्वार शाखाएं नदी देवियों और उनके अनुचरों से अलंकृत हैं। सिरदल भाग पर सरस्वती गणेश के मध्य नटराज नवग्रह तथा सप्त मातृकाओं से युक्त है। गर्भ गृह के मध्य शिवलिंग प्रतिस्थापित है। बाह्य भित्तियों में दिक्पल वसु, शिव की विविध रुपों में अजपाद शिव, शिव परिवार, विष्णु अवतार, नायिकाओं, मिथुन दृश्य तथा गजशार्दुल का शिल्पांकन है।

पुरातत्व विभाग के अनुसार विराट मंदिर में योग मुद्रा में भदगवान शिव और विष्णु जी की विभिन्न मुद्राओं में प्रतिमाएं स्थापित हैं। साथ ही सर्वाधिक प्रतिमाएं नायिकाओं की हैं। विभिन्न अभिलिखित योगिनी प्रतिमाएं जिस संख्या में यहां हैं, देश या प्रदेश के किसी भी स्थल में नहीं हैं ।

झुक गया शिखर
वर्तमान में विराट मंदिर का शिखर करीब डेढ़-दो फीट पीछे की ओर झुक गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेझण विभाग ने मंदिर को संरक्षित एवं सुरक्षित करने का प्रयास भी किया है। और मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है। लेकिन मंदिर का शिखर पूर्व स्थिति में नहीं आ पाया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पहलू ये है कि निर्माण कार्य के दौरान आधुनिक पद्धति की बजाय पौराणणिक पद्धति का इस्तेमाल किया गया है। जिससे मंदिर का मूल स्वरूप नहीं बिगड़ा है।