20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

आदिवासियों के घर का ‘मेहमान’ होता है महुआ

बिचौलिए कम दाम पर खरीद करते हैं भंडारण

2 min read
Google source verification

image

Shahdol online

Apr 18, 2016

earning money from mahua

earning money from mahua

शहडोल. संभाग के जंगलों में लगा महुआ भले ही आदिवासियों के नाम पर उठाया जा रहा हो, लेकिन वह महुआ आदिवासियों के घर सिर्फ मेहमान बनकर आता है। इसके बाद बिचौलिए उसे खरीदकर अपने घर भंडारित कर मंहगे दाम में बेच रहे हैं।
आदिवासी बाहुल्य संभाग में महुए का गोरखधंधा आदिवासियों के नाम पर चलाया जा रहा है। बिचौलिए आदिवासियों के माध्यम से जंगलों से महुआ एकत्रित करवाते हैं, इसके बाद उन्हीं के घरों और बाजारों से महुआ खरीदकर अपने यहां भंडारित कर रहे हैं। इस की जानकारी वन अमले के साथ-साथ जिला प्रशासन को भी है, लेकिन महुआ का गोरखधंधा करने वाले कारोबारियों पर आज तक कार्रवाई नहीं की जा सकी है। बिचौलिए आदिवासी परिवारों पर पूरी नजर रखते हैं, जैसे ही घर पहुंचा महुआ सूखने लगता है, वे खरीदी के लिए पहुंच जाते हैं।

बिचौलियों का नेटवर्क करता है काम
महुआ का गोरखधंधा करने वाले कारोबारियों का नेटवर्क समूचे आदिवासी क्षेत्र में फैला हुआ है। अवैध कारोबारी उन गांवों में पैनी नजर बनाकर रखते हैं, जो गांव महुआ पेड़ की अधिकता वाले जंगलों से सटे रहते हैं। गांव-गांव वो अपने दलाल तैयार करके रखते हैं, जो आदिवासियों द्वारा महुआ एकत्रिकरण की पूरी जानकारी रखते हैं। दलाल खुद आदिवासियों से महुआ खरीदकर बड़े व्यापारियों तक पहुंचा देते हैंं।

कारोबारियों के घर कैद हो जाता महुआ
आदिवासियों के घर में मेहमान बनने के बाद महुआ दलालों के माध्यम से बड़े कारोबारियों के घर पहुंच जाता है। इसके बाद उसे गोरखधंधा करने वाले कारोबारी तक-तक सुखा भंडारित करके रखते हैं, जब तक महुआ का दाम आसमान न छूने लगे। बताया गया कि वर्तमान समय में संभाग में ऐसे कई कारोबारी हैं जिनके घरों पर पिछले कई साल से महुआ भारी मात्रा में कैद है।
घर से ही बिक्री की देते हैं सुविधा
महुआ के इस गोरखधंधे में आदिवासियों को माध्यम बनाकर किस प्रकार से दोहन किया जा रहा है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बड़े व्यापारी आदिवासियों के घर से ही महुआ खरीदकर ले जाते हैं। इसके लिए गांव-गांव मालवाहक भेजकर वो महुआ एकत्रित करते हैं। पहले गांव में तैनात दलाल आदिवासियों से सौदा कर लेता है, इसके बाद उन्हीं के घरों में वजन कराकर बड़े व्यापारी महुआ अपने घर ले आते हैं।

इधर राजस्व में कितना महुआ? सभी अनजान
एक ओर जंगल की जमीन पर लगे महुआ की जानकारी वन अमले को नहीं है, वहीं दूसरी ओर राजस्व भूमि पर लगे महुआ की जानकारी राजस्व अमले के पास भी नहीं है। इस ओर जिला प्रशासन ने भी कभी कोई सर्वे कार्य नहीं कराया है, जिस कारण प्रशासनिक अधिकारियों के पास भी कोई संख्या उपलब्ध नहीं है। क्षेत्र के पटवारियों ने बताया कि इस संबंध में कभी कोई दिशा-निर्देश नहीं मिलने के कारण ऐसी स्थिति निर्मित हुई। वहीं जब प्रशासनिक अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों से यह पूछा गया कि आखिर राजस्व भूमि में लगे महुआ पेड़ से होने वाल उत्पादन कहां जाता है, इससे लाभ का फायदा कौन उठा रहा है, इस पर सभी जवाबदारों ने चुप्पी साध ली।

ये भी पढ़ें

image