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Republic Day 2018: फांसी पर चढ़ने से पहले क्रांतिकारी शहीद अश्फाक उल्ला खां के क्या थे अंतिम शब्द, देखें वीडियो

Republic Day 2018 पर पत्रिका ने की काकोरी काण्ड के नायक अमर शहीद अश्फाक उल्ला खां के प्रपौत्र अश्फाक उल्ला खां से खास बातचीत।

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Shaheed Ashfaq Ulla Khan

Shaheed Ashfaq Ulla Khan

शाहजहांपुर। क्रांतिकारियों की शहादत पर शेर कहा जाता है कि शहीदों की मजारों पर, चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा। लेकिन अफसोस इस बात का है, कि ये बातें सिर्फ बातें ही रहीं, हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। ये कहना है काकोरी काण्ड के नायक अमर शहीद अश्फाक उल्ला खां के प्रपौत्र अश्फाक उल्ला खां का। शहीद परदादा की याद को जिंदा रखने के लिए उन्हें परदादा का ही नाम दिया गया। पत्रिका ने की उनसे खास बातचीत, पढ़िए प्रमुख अंश —

फांसी से पहले ये कहा था शहीद अश्फाक उल्ला खां ने
शहीद क्रांतिकारी शहीद अश्फाक उल्ला खां के प्रपौत्र बताते हैं कि उनके परदादा ने फैजाबाद जेल में फांसी पर चढ़ने से पहले कहा था— मेरे हाथ इंसान के खून से कभी नहीं रंगे, मेरे ऊपर जो इल्जाम लगाया गया है वो गलत है, खुदा के यहां मेरा इन्साफ होगा। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने कभी घुटने नहीं टेके। सरकारी गवाह बनने से भी इंकार कर दिया और 19 दिसंबर 1927 को महज 27 साल की उम्र में वतन की खातिर फांसी पर झूल गए।

शहादत को भुला दिया गया
शहीद अश्फाक उल्ला खां के प्रपौत्र दुखी मन से कहते हैंं कि शाहजहांपुर शहर शहीदों की नगरी होने के साथ साथ हिंदू मुस्लिम एकता की भी मिसाल है। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल और अश्फाक उल्ला खां की गहरी दोस्ती ने पूरी दुनिया को धर्मनिरपेक्षता का पैगाम दिया था। लेकिन अफसोस इस बात का है जिन शहीदों की शहादत के बारे में आज के नौजवानों को प्रेरणा देनी चाहिए थी, उनकी शहादत को भुला दिया गया। गणेश शंकर विद्यार्थी ने कहा था कि शहीद अश्फाक उल्ला खां की मजार पूरे उत्तर प्रदेश में एक मिसाल होगी। लेकिन अफसोस की बात ये है कि आज तक वो मजार ही नहीं बन पाया। राम प्रसाद बिस्मिल और अश्फाक उल्ला खां की दोस्ती की मिसाल रहा आर्य समाज मंदिर जो एक ऐतिहासिक स्थल है, उनके हालातों पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया।

पूर्वजों ने बताए बेमिसाल दोस्ती के किस्से
अश्फाक बताते हैं कि एक बार क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल आर्य समाज मंदिर में हवन कर रहे थे। उसी समय बाहर शोर की आवाज आयी तो अश्फाक उल्ला खां उठकर बाहर गए, और बोले अगर तुम्हें मंदिर तक पहुंचना है तो हमारी लाश से गुजरना होगा। उसके बाद वे उन्हें जाने के लिए मजबूर कर देते हैं। अश्फाक ये भी बताते हैं कि उनके परदादा अश्फाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल को राम कहकर बुलाते थे।

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