
10 साल की उम्र में एक छोटी लड़की अपने सपनो को केवल सोच पाती है लेकिन शाहजहांपुर की चाहत के लिए ऐसा कुछ भी कर पाना संभव नहीं है। ये नन्ही बच्ची केवल 10 साल की उम्र में अपने परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ अपने नाजुक कन्धों पर उठा रही है। इतनी सी उम्र में ये ठेला लगाती है। पिता के गुजर जाने के बाद वही अपनी मां-बहनों का एक मात्र सहारा है।
शाहजहांपुर के जलालाबाद कस्बे में रहने वाली चाहत ने पिता मेवाराम को 10 साल पहले खो दिया था। इससे उसकी मां सीता बुरी तरह टूट गई। कोई बेटा न होने के कारण परिवार को संभालने वाला कोई मर्द नहीं था। मेवाराम और सीता की केवल 4 बेटियां थी।
पति के जाने के बाद मां को थी बेटे की आस
मेवाराम के निधन के वक्त सीता गर्भवती थी और उसे ये उम्मीद थी कि पति के गुजर जाने के बाद उसे सहारा देने वाला बेटा नसीब होगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उसकी जगह चाहत ने जन्म लिया लेकिन मां की आस टूट चुकी थी। कस्बे के कारखानों में छिलके बीनकर सीता ने अपनी बेटियों को पाला-पोसा। जैसे-जैसे बेटियों बड़ी होती गई उनकी शिक्षा और शादी की चिंता ने सीता को अंदर से और कमजोर कर दिया।
6 साल की नाजुक उम्र में ही चाहत ने अपने परिवार की बुरी हालत को समझ लिया था। अपने बचपन की मासूमियत को मेहनत में बदलकर उसने ठेला चलाने का काम शुरू किया। शुरू में दिक्कतें आई लेकिन आज सालों की लगन से उसने इस काम में माहरत हासिल कर ली है। इसी के दम पर उसने दोनों बहनों शिखा और प्रियंका की शादी करवाई और दान-दहेज भी दिया।
चाहत की दोनों बहनें करती है मदद
बहनों में आपसी प्यार और सहयोग इतना ज्यादा है कि भले ही दो बहनों की शादी हो गई लेकिन बाकी दो बहनें काजल और सुनैना अपनी मां सीता के साथ मिलकर चाहत की मदद करती है। इस तरह पूरा परिवार एक-दूसरे की मदद करते हुए रोजाना कड़ी मेहनत करता है ताकि दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके।
शाहजहांपुर की इस 'गुड्डी' की हिम्मत ने उम्र को भी बौना साबित कर दिया है। वो अपने सपनों को उड़ान देना चाहती है लेकिन परिवार की फिलहाल ऐसी हालत नहीं कि वह सपनों की नई दहलीज बना सकें हालांकि अपने दम पर वो इसे सच कर दिखाने का दम जरूर रखती है।
Updated on:
11 Nov 2022 07:31 pm
Published on:
11 Nov 2022 06:12 pm
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