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बदहाली पर आंसू बहाते शहीदों के स्मारक

अश्फाक उल्ला खां की मजार तो अब जुआरिओं और सटोरियों का अड्डा बन चुकी है।

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Republic Day 2018

शाहजहांपुर। शाहजहांपुर की धरती पर पैदा हुए तीन आजादी के दीवानों ने फांसी के फंदे पर लटकने से पहले इस देश की खातिर एक बार उफ तक भी नहीं की लेकिन काकोरी कांड के महानायक पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह के घर परिवार और मकबरे आज आजादी के सात दशक बाद भी बदहाल हैं।

26 जनवरी को पूरा देश गणतंत्र दिवस के जश्न मे सराबोर होगा और देश भर में शहीदों को सलाम किया जायेगा लेकिन इस खबर से आप जानेंगे कि आखिर अमर शहीदों से जुड़ी यादें किस हाल में हैं। अमर शहीदों की प्रतिमाओं स्मारकों और उनके घरों की उपेक्षा किस तरह की जाती है इसका एक दुखद नजारा आपको शाहजहांपुर में देखने को मिल जायेगा। जहां शहीदों से जुड़े स्थल जर्जर हालत में हैं तो वहीं आश्फाक उल्ला और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल की प्रतिमाओं के आगे दीवार खड़ी कर उनका मजाक बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं अश्फाक उल्ला खां की मजार तो अब जुआरिओं और सटोरियों का अड्डा बन चुकी है। इतना ही नहीं पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के घर पर तो दबंगों का कब्जा है। खास बात ये भी है कि पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अश्फाक उल्ला खां जिस एबीरिच स्कूल में पढ़ते थे वो स्कूल तो आज खंडहर में तब्दील हो रहा है उसकी बिल्डिंग जर्जर हालात में है। शहीदों का ये हाल देखकर सरकारों की शहीदों के प्रति बेरुखी देख् कर के शहीदों के परिवार के लोगों के दिल में आज के दिन एक कसक उठ रही है।

अगर हम शाहजहांपुर के एबीरिच इंटर कॉलेज स्कूल के रिकॉर्ड को देखें तो पंडित रामप्रसाद बिस्मिल सन् 1919 में कक्षा सात में पढ़ते थे। सत्र के पहले महीने में ही अपनी गरीबी के चलते फीस के 3.20 रुपए ( तीन रुपए बीस पैसे ) नहीं दे सके और स्कूल प्रशासन ने नाम काट दिया जो आज भी रिकॉर्ड में दर्ज है। उस मूल रजिस्टर की कॉपी है। जिसे स्कूल के प्रिंसिपिल ने भी बताया है। अशफाक उल्ला खां पठान परिवार से थे। कक्षा आठ में पढ़ते थे। फीस तीन रुपए बीस पैसे थी। पंडित रामप्रासाद बिस्मिल ने अपने मुफलिसी के दिनों में स्कूल की फीस जमा नहीं कर पायी और अंग्रेजी हुकूमत में उन शिक्षकों ने भी बिस्मिल की ओर ध्यान नहीं दिया और नाम काट दिया। लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी सरकारों की बेरुखी के चलते मुफलिसी का दाग बिस्मिल से दूर नहीं हो रहा है। शाहजहांपुर में बिस्मिल के उस मकान पर आज भी दबंगों का कब्जा है जिसे बिस्मिल के परिजनों से दबंगों ने उनकी गरीबी और कमजोरी का फायदा उठाकर उनसे औने पौने दामों में खरीद लिया था।

आपको बता दें कि शाहजहांपुर की जमीं पर पंडित रामप्रसाद बिसमिल, अश्फाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह जैसे वीर सपूत जो पैदा हुए थे ब्रिटिश हुकूमत से अपनी भारत माता को आज़ाद करने के लिए जब इन नौजवानों को हथियार खरीदने के लिए पैसों की जरूरत पड़ी तो इन नौजवानों ने सरकारी खजाने को लूटने का मन बनाया। नौ अगस्त 1925 को लखनऊ से पहले काकोरी जगह पर ट्रेन में अंगेजो द्वारा ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को इन तीनों लोगों ने अपने साथियों के साथ उस खजाने को लूट लिया। ट्रेन डकैती के इस कांड के आरोप में शाहजहांपुर के इन तीनों नौजवानों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। मुकदमा चलकर 19 दिसंबर 1927 को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर अश्फाक उल्ल खां को फ़ैज़ाबाद जेल और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद जेल में ब्रिटिश हुकूमत ने इन नौजवानों को फांसी पर लटका दिया।

शाहजहांपुर की जमीं पर पैदा हुए आजादी के दीवाने अश्फाक उल्ला खां, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह देश की आजादी के खातिर हंसते हंसते फांसी पर झूल गये लेकिन आज आज भी इनके स्मारक और प्रतिमाएं बदहाल हैं। पूरे साल इन स्मारकों और प्रतिमाओं की घोर उपेक्षा की जाती है। सिर्फ राष्ट्रीय त्योहारों पर ही इन शहीदों को फूलों से नवाजा जाता है। बाकी दिनों में तो ये अपनी बदहाली पर आंसू ही बहाती नजर आती है। अश्फाक उल्ला खां की मजार आज जर्जर हालत में है। शहीदों के परिवार वालों के मन इस बात से बेहद दुखी हैं।

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