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बिल से बाहर निकलकर चूहे ने दिखाई माता सती और महादेव की मूर्ति!

नवरात्रि में शाजापुर के माता राजराजेश्वरी मंदिर में पूजा और दर्शन के लिए भक्तों की कतार लग रही है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां सती माता का दाहिना चरण गिरा था। इसका निशान अभी-भी यहां है जिसका पूजन किया जाता है। इस पुराने मंदिर में शंकराचार्य स्वरूपानंदजी ने मां त्रिपुर सुंदरी की स्थापना भी की थी। मंदिर में माता सती और महादेव की अनूठी मूर्ति है। खास बात यह है कि यह मूर्ति खुदाई में निकली जिसके स्थान का इशारा एक चूहे ने किया था।

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शाजापुर के माता राजराजेश्वरी मंदिर में पूजा और दर्शन के लिए भक्तों की कतार

नवरात्रि में शाजापुर के माता राजराजेश्वरी मंदिर में पूजा और दर्शन के लिए भक्तों की कतार लग रही है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां सती माता का दाहिना चरण गिरा था। इसका निशान अभी-भी यहां है जिसका पूजन किया जाता है। इस पुराने मंदिर में शंकराचार्य स्वरूपानंदजी ने मां त्रिपुर सुंदरी की स्थापना भी की थी। मंदिर में माता सती और महादेव की अनूठी मूर्ति है। खास बात यह है कि यह मूर्ति खुदाई में निकली जिसके स्थान का इशारा एक चूहे ने किया था।

मां राजराजेश्वरी मंदिर के पुजारी पंडित आशीष नागर ने बताया कि देश के चारों पीठ के शंकराचार्यों ने दर्शन करने के बाद इसे 52वां गुप्त शक्तिपीठ बताया था। 1991 में शंकराचार्य स्वरूपानंदजी ने स्कंद पुराण के अनुसार मंदिर की स्थिति को देखते हुए इसे शक्तिपीठ कहा था।

मंदिर के पीछे से निकली चीलर नदी मंदिर के ठीक पीछे चंद्राकार (चंद्रभागा) है। ऐसा स्थान कोणार्क के बाद शाजापुर में ही है। माता के दाहिने चरण का निशान हैं। शंकराचार्य स्वरूपानदंजी ने मंदिर के समीप मां त्रिपुर सुंदरी की स्थापना की थी। साथ ही मां राजराजेश्वरी के मंदिर में छत पर बने हुए श्रीयंत्र को माता के समक्ष स्थापित किया था।

रोडवाल ब्राह्मण समाज मां का कुलदेवी के रूप में पूजन करता है। इसलिए माता को रोडे़श्वरी माता भी कहा जाता है। मंदिर में देश-विदेश से भक्त पहुंचते हैं। विशेष बात यह है कि पूर्ण श्रद्धा के साथ मां से मांगी हर मनोकामना को पूर्ण होती है।

चूहे के संकेत के बाद दिखी महादेव की प्रतिमा
पंडित नागर ने बताया कि पूर्व में माता के गर्भगृह के ठीक बाहर के स्थान पर शनिदेव मानकर पूजन किया जाता था। 1968 में दादाजी को स्वप्न आया था कि यहां शिव परिवार की प्रतिमा है जिसे बाहर निकाला जाए। सुबह जब पं. हरिशंकर नागर मंदिर में आरती करके निकले तो शनिदेव के स्थान से एक चूहा बिल से बाहर निकला। चूहे के इस संकेत के बाद जब झांककर देखा तो वहां महादेव की प्रतिमा दिखी।

इसके बाद खुदाई करवाने पर माता सती को उठाए महादेव की प्रतिमा के साथ शिव परिवार, त्रिशूल, चिमटा निकला था। इसकी यहां विधिवत स्थापना की गई। राजा भोज के समय मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया।
इस मंदिर का जीर्णोद्धार सन 1060 में हुआ था। सभा मंडप का निर्माण 1734 में कराया गया।

बताया जाता है कि आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग से स्टाफ के साथ गुजर रहे तत्कालीन सिविल सर्जन की कार के सामने अचानक एक शेर आकर खड़ा हो गया था। सभी लोगों ने माता को याद किया तो शेर चला गया। इसके बाद सिविल सर्जन व स्टाफ ने अपना एक-एक माह का वेतन देकर हवन कुंड के स्थान पर सिंह प्रतिमा की स्थापना कराई।

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